Friday, July 31, 2020

मांस खाना महापाप है।

मांस खाना हराम है।

  • मांस खाने का आदेश अल्लाह का नहीं है। न ही कुरान शरीफ़ में इसके खाने का ज़िक्र अल्लाह ने स्वयं किया। जो वेद या ग्रंथ मांस खाने को कहे वह परमात्मा का ज्ञान हो ही नहीं सकता। ऐसा तो केवल कोई शैतान ही ज़बरदस्ती करवाता है। आपको बता दें कि मुसलमानों की सबसे पवित्र किताब कुरान है जिसे पूरा मुस्लिम समाज मानता है।महत्वपूर्ण बात यह है कि परमात्मा ने इसमें मांस खाने का कहीं कोई आदेश नही है।

            मांस खाने का आदेश जिब्राइल फरिश्ते का था जिसे मुस्लिम भाई परमात्मा का फरमान मान बैठे और पाप के गर्त में डूब गए। पूरे दिन भूखे प्यासे रह कर पांच वक्त की नमाज़ पढ़ते हुए अल्लाह से अपने गुBनाहों की माफ़ी मांगते हो।
एक तरफ तो इबादत करते है  दूसरी तरफ अल्लाह के बच्चों का हल्लाह करते हो तो वह अल्लाह कैसे खुश हो  सकता है?
और न ही मांस खाना किसी भी धर्म ग्रन्थ में  है। जो व्यक्ति मांस खा रहा है वह परमात्मा के विधान को तोड़  रहा है।

खून खराबा करना  महापाप
खून खराबा करना अल्लाह कबीर जी का आदेश नही है।
  • हजरत मोहम्मद जी ने कभी मांस नही खाया फिर आज का मुसलमान धर्म क्यों  खा रहा है।

हजरत मुहम्मद जी जिस साधना को करता था वही साधना अन्य मुसलमान समाज भी
कर रहा है। वर्तमान में सर्व मुसलमान श्रद्धालु माँस भी खा  रहे ह परन्तु नबी मुहम्मद जी ने  माँस नहीं खाया तथा न ही उनके सीधे अनुयाईयों(एक लाख अस्सी हजार) ने माँस खाया।
केवल रोजा व बंग तथा नमाज किया करते थे। गाय आदि को बिस्मिल(हत्या) नहीं करते थे।
नबी मुहम्मद नमस्कार है, राम रसूल कहाया।
एक लाख अस्सी कूं सौगंध, जिन नहीं करद चलाया।।
अरस कुरस पर अल्लह तख्त है, खालिक बिन नहीं खाली।
वे पैगम्बर पाख पुरुष थे, साहिब के अब्दाली।।


भावार्थ :- नबी मोहम्मद तो आदरणीय है जो प्रभु के अवतार कहलाए हैं। कसम है एक लाख
अस्सी हजार को जो उनके अनुयाई थे उन्होंने भी कभी बकरे, मुर्गे तथा गाय आदि पर करद
नहीं चलाया अर्थात् जीव हिंसा नहीं की तथा माँस भक्षण नहीं किया। वे हजरत मोहम्मद, हजरत
मूसा, हरजत ईसा आदि पैगम्बर(संदेशवाहक) तो पवित्रा व्यक्ति थे तथा ब्रह्म(ज्योति निरंजन/काल)
के कृपा पात्रा थे, परन्तु जो आसमान के अंतिम छोर(सतलोक) में पूर्ण परमात्मा(अल्लाहू अकबर
अर्थात् अल्लाह कबीर) है उस सृष्टी के मालिक की नजर से कोई नहीं बचा।

मारी गऊ शब्द के तीरं, ऐसे थे मोहम्मद पीरं।।
शब्दै फिर जिवाई, हंसा राख्या माँस नहीं भाख्या, एैसे पीर मुहम्मद भाई।।

 भावार्थ : एक समय नबी मुहम्मद ने एक गाय को शब्द(वचन सिद्धि) से मार कर सर्व के
सामने जीवित कर दिया था। उन्होंने गाय का माँस नहीं खाया। अब मुसलमान समाज
वास्तविकता से परिचित नहीं है। जिस दिन गाय जीवित की थी उस दिन की याद बनाए रखने
के लिए गऊ मार देते हो। आप जीवित नहीं कर सकते तो मारने के भी अधिकारी नहीं हो।
आप माँस को प्रसाद रूप जान कर खाते तथा खिलाते हो। आप स्वयं भी पाप के भागी बनते
हो तथा अनुयाईयों को भी गुमराह कर रहे हो। आप दोजख (नरक) के पात्रा बन रहे हो।


  •  कबीर अल्लाह ने मांस खाने वालर व्यक्तियों के बारे में बताया है।


जो व्यक्ति माँस खाते हैं,
शराब पीते हैं, सत्संग सुनकर भी बुराई नहीं त्यागते, उपदेश प्राप्त नहीं करते, उन्हें तो साक्षात
राक्षस जानों। अनजाने में गलती न जाने किससे हो जाए। यदि वह बुराई करने वाला व्यक्ति
सत्संग विचार सुनकर बुराई त्याग कर भगवान की भक्ति करने लग जाता है वह तो नेक आत्मा
है, वह चाहे किसी जाति व धर्म का हो। जो माँस आहार तथा सुरा पान त्याग कर प्रभु भक्ति
नहीं करता वह तो ढेड(नीच) व्यक्ति है, चाहे किसी जाति या धर्म का हो। भावार्थ है कि उच्च
कर्म करने वाला उच्च है तथा नीच कर्म करने वाला नीच है। जाति या धर्म विशेष में जन्म मात्रा
से उच्च-नीच नहीं होता। जिन साधकों ने उपदेश ले रखा है उन्हें उपरोक्त प्रकार के बुराई
करने वालों के पास नहीं बैठना चाहिए, जिससे आपकी भक्ति में बाधा पड़ेगी।
जो व्यक्ति माँस भक्षण करते हैं, शराब पीते हैं, जो स्त्रा वैश्यावृति करती है तथा जो व्यक्ति
उससे व्यवसाय करवा कर वैश्या से धन प्राप्त करते हैं, जुआ खेलते हैं तथा चोरी करते है,
समझाने से भी नहीं मानते, वह तो महापाप के भागी हैं तथा घोर नरक में गिरेंगे।
माँस चाहे गाय, हिरनी तथा मुर्गी आदि किसी प्राणी का है जो व्यक्ति माँस खाते हैं वे नरक
के भागी हैं। जो व्यक्ति अनजाने में माँस खाते हैं(जैसे आप किसी रिश्तेदारी में गए, आपको
पता नहीं लगा कि सब्जी है या माँस, आपने खा लिया) तो आप को दोष नहीं, परन्तु आगे से
अति सावधान रहना। जो व्यक्ति आँखों देखकर भी खा जाते हैं वे दोषी हैं। यह माँस तो कुत्ते
का आहार है, मनुष्य शरीर धारी के लिए वर्जित है।
जो गुरुजन माँस भक्षण करते हैं तथा शराब पीते हैं उनसे नाम दीक्षा प्राप्त करने वालों की
मुक्ति नहीं होती अपितु महा नरक के भागी होंग।
जो व्यक्ति जीव हिंसा करते हैं (चाहे गाय, सूअर, बकरी, मुर्गी, मनुष्य, आदि किसी भी
प्राणी को स्वार्थवश मारते हैं) वे महापापी हैं, (भले ही जिन्होंने पूर्ण संत से पूर्ण परमात्मा का
उपदेश भी प्राप्त है) वे कभी मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकते ।।
     

जीव हत्या महापाप
बेजुबानों जीवो की हत्या करने से अल्लाह कभी खुश नही होता है।

बकरी जो आपने मार डाली वह तो घास-फूंस, पत्ते आदि खाकर पेट भर रही थी। इस काल
लोक में ऐसे शाकाहारी पशु की भी हत्या हो गई तो जो बकरी का माँस खाते हैं उनका तो
अधिक बुरा हाल होगा(साखी 18)।
पशु आदि को हलाल, बिस्मिल आदि करके माँस खाने व प्रसाद रूप में वितरित करने का
आदेश दयालु (करीम) प्रभु का कब प्राप्त हुआ(क्योंकि पवित्रा बाईबल उत्पत्ति ग्रन्थ में पूर्ण
परमात्मा ने छः दिन में सृष्टी रची, सातवें दिन ऊपर तख्त पर जा बैठा तथा सर्व मनुष्यों के
आहार के लिए आदेश किया था कि मैंने तुम्हारे खाने के लिए फलदार वृक्ष तथा बीजदार पौधे
दिए हैं।



  •  उस करीम (दयालु प्रभु पूर्ण परमात्मा) की ओर से आप को फिर से कब आदेश हुआ? वह कौन-सी कुआर्न में लिखा है ? पूर्ण परमात्मा सर्व मनुष्यों आदि की सृष्टी रचकर ब्रह्म(जिसेअव्यक्त कहते हो, जो कभी सामने प्रकट नहीं होता, गुप्तकार्य करता तथा करवाता रहता है)को दे गया।


 बाद में पवित्रा बाईबल तथा पवित्रा कुआर्न शरीफ आदि ग्रन्थों में जो विवरण है वह
ब्रह्म (काल/ज्योति निरंजन) का तथा उसके फरिश्तों का है, या भूतों-प्रेतों का है। करीम अर्थात्
पूर्ण ब्रह्म दयालु अल्लाहु कबीरू का नहीं है। उस पूर्ण ब्रह्म के आदेश की अवहेलना किसी भी
फरिश्ते व ब्रह्म आदि के कहने से करने की सजा भोगनी पड़ेगी।)
एक समय एक व्यक्ति की दोस्ती एक पुलिस थानेदार से हो गई। उस व्यक्ति ने अपने दोस्त
थानेदार से कहा कि मेरा पड़ोसी मुझे बहुत परेशान करता है। थानेदार कहा कि मार
लट्ठ, मैं आप निपट लूंगा। थानेदार दोस्त की आज्ञा का पालन करके उस व्यक्ति ने अपने पड़ोसी
को लट्ठ मारा, सिर में चोट लगने के कारण पड़ौसी की मृत्यु हो गई। उसी क्षेत्रा का अधिकारी होने
के कारण वह थाना प्रभारी अपने दोस्त को पकड़ कर लाया, कैद में डाल दिया तथा उस व्यक्ति को
मृत्यु दण्ड मिला। उसका दोस्त थानेदार कुछ मदद नहीं कर सका। क्योंकि राजा का संविधान है
कि यदि कोई किसी की हत्या करेगा तो उसे मृत्यु दण्ड प्राप्त होगा। उस नादान व्यक्ति ने अपने
मित्रा दरोगा की आज्ञा मान कर राजा का संविधान भंग कर दिया। जिससे जीवन से हाथ धो बैठा।
ठीक इसी प्रकार पूर्ण परमात्मा की आज्ञा की अवहेलना करने वाला पाप का भागी होगा।
क्योंकि कुआर्न शरीफ (मजीद) का सारा ज्ञान ब्रह्म (काल/ज्योति निरंजन, जिसे आप अव्यक्त
कहते हो) का दिया हुआ है। इसमें उसी का आदेश है तथा पवित्रा बाईबल में केवल उत्पत्ति ग्रन्थ के
प्रारम्भ में पूर्ण प्रभु का आदेश है। पवित्रा बाईबल में हजरत आदम तथा उसकी पत्नी हव्वा को उस
पूर्ण परमात्मा ने बनाया। बाबा आदम की वंशज संतान हजरत ईस्राईल, राजा दऊद, हजरत मूसा,
हजरत ईसा तथा हजरत मुहम्मद आदि को माना है। पूर्ण परमात्मा तो छः दिन में सृष्टी रचकर
तख्त पर विराजमान हो गया। बाद का सर्व कतेबों (कुआर्न शरीफ आदि) का ज्ञान ब्रह्म
(काल/ज्योति निरंजन) का प्रदान किया हुआ है।

बेजुबानों की हत्या
जीव हत्या करना हराम है।

पवित्रा कुआर्न का ज्ञान दाता स्वयं कहता है कि
पूर्ण परमात्मा जिसे करीम, अल्लाह कहा जाता है उसका नाम कबीर है, वही पूजा के योग्य उसके तत्वज्ञान व भक्ति विधि को किसी बाखबर (तत्वदर्शी संत) से पता करो। इससे सिद्ध है कि
जो ज्ञान कुआर्न शरीफ आदि का है वह पूर्ण प्रभु का नहीं है (साखी
जब काजी के पुत्रा की मृत्यु हो जाती है तो काजी को कितना कष्ट होता है। पूर्ण ब्रह्म(अल्लाह
कबीर) सर्व का पिता है। उसके प्राणियों को मारने वाले से अल्लाह खुश नहीं होता
दर्द सर्व को एक जैसा ही होता है। अनजान नहीं जानते। यदि बकरे आदि का गला काट कर
(हलाल करके) उसे स्वर्ग भेज देते हो तो काजी तथा मुल्ला अपना गला छेदन करके (हलाल करके)
स्वर्ग प्राप्ति क्यों नहीं करते ?
जिस समय बकरी को मुल्ला मारता है तो वह बेजुबान प्राणी आँखों में आंसू भर कर म्यां-म्यां
करके समझाना चाहता है कि हे मुल्ला मुझे मार कर पाप का भागी मत बन। जब परमेश्वर के न्याय
अनुसार लेखा किया जाएगा उस समय तुझे बहुत संकट का सामना करना पड़ेगा।
जबरदस्ती (बलात्) निर्दयता से बकरी आदि प्राणी को मारते हो, कहते हो हलाल कर रहे हैं।
इस दोगली नीति का आपको महा कष्ट भोगना होगा। काजी तथा मुल्ला व कोई भी जीव हिंसा
करने वाला पूर्ण प्रभु के कानून का उल्लंघन कर रहा है, जिस कारण वहाँ धर्मराज के दरबार में
खड़ा-खड़ा पिटेगा। यदि हलाल ही करने का शौक है तो काम, क्रोध, मोह, अहंकार, लोभ आदि को
कर।
पाँच समय निमाज भी पढ़ते हो तथा रोजों के समय रोजे (व्रत) भी रखते हो। शाम को गाय,
बकरी, मुर्गी आदि को मार कर माँस खाते हो। एक तरफ तो परमात्मा की स्तुति करते हो दूसरी
ओर उसी के प्राणियों की हत्या करते हो। ऐसे प्रभु कैसे खुश होगा ? अर्थात् आप स्वयं भी पाप के
भागी हो रहे हो तथा अनुयाईयों को भी गुमराह करने के दोषी होकर नरक में गिरोगे।
कबीर परमेश्वर कह रहे हैं कि हे काजी, मुल्लाओं आप पीर (गुरु) भी कहलाते हो। पीर तो वह
होता है जो दूसरे के दुःख को समझे उसे, संकट में गिरने से बचाए। किसी को कष्ट न पहुँचाए। जो
दूसरे के दुःख में दुःखी नहीं होता वह तो काफिर (नीच) बेपीर (निर्दयी) है। वह पीर (गुरु) के योग्य
नहीं है।
उत्तम खाना नमकीन खिचड़ी है उसे खाओ। दूसरे का गला काटने वाले को उसका बदला देना
पड़ता है। यह जान कर समझदार व्यक्ति प्रतिफल में अपना गला नहीं कटाता। दोनों ही धर्मों के
मार्ग दर्शक निर्दयी हो चुके हैं। हिन्दूओं के गुरु कहते हैं कि हम तो एक झटके से बकरा आदि का
गला छेदन करते हैं, जिससे प्राणी को कष्ट नहीं होता, इसलिए हम दोषी नहीं हैं तथा मुसलमान
धर्म के मार्ग दर्शक कहते हैं हम धीरे-धीरे हलाल करते हैं जिस कारण हम दोषी नहीं। परमात्मा
कबीर साहेब जी ने कहा यदि आपका तथा आपके परिवार के सदस्य का गला किसी भी विधि से
काटा जाए तो आपको कैसा लगेगा ?
बात करते हैं पुण्य की, करते हैं घोर अधर्म।
दोनों नरक में पड़हीं, कुछ तो करो शर्म।।


गाय की हत्या महापाप
जीव हिंसा महापाप

कबीर परमेश्वर ने कहा -

हम मुहम्मद को सतलोक ले गया। इच्छा रूप वहाँ नहीं रहयो। उल्ट मुहम्मद महल पठाया, गुज बीरज एक  कलमा लाया।। रोजा, बंग, नमाज दई रे, बिसमिल की नहीं बात कही रे।
भावार्थ :- नबी मुहम्मद को मैं(कबीर परमेश्वर) सतलोक ले कर गया था परन्तु वहाँ न रहने
की इच्छा व्यक्त की, वापिस मुहम्मद जी को शरीर में भेज दिया। नबी मुहम्मद जी ने रोजा(व्रत)
बंग(ऊँची आवाज में प्रभु स्तुति करना) तथा पाँच समय की नमाज करना तो कहा था परन्तु
गाय आदि प्राणियों को बिस्मिल करने(मारने) को नहीं कहा।


रोजा बंग नमाज दई रे , बिस्मिल की नहीं बात कही रे “ मोहम्मद जी का केवल इतना ही आदेश था।उन्होंने गाय कभी बिस्मिल नहीं की।
हज़रत मुहम्मद जी ने कभी मांस नहीं खाया, न खाने का आदेश दिया। इन क़ाज़ी, मुल्लाओं ने, फरिश्तों ने डरा धमकाकर कर किसी के शरीर में प्रवेश करके ये सब गलत अफवाएं फैलाई। हज़रत मुहम्मद जी ने तो अपनी सिद्धि से एक मरी हुई गाय जीवित करी थी।

नबी मुहम्मद नमस्कार है राम रसूल कहाया 1लाख 80 को सौगंध जिन नहीं करद चलाया।
अरस कुरस पर अल्लह तख्त है खालिक बिन नहीं खाली।
वे पैगंबर पाक़ पुरुष थे, साहिब के अब्दाली।”

नबी मुहम्मद जी तो परमात्मा की बहुत नेक आत्मा थीं। उन्होंने कभी मांस नहीं खाया, न अपने 1,80,000 शिष्यों को खाने को कहा।
कबीर साहेब जी ने भी 600 वर्ष पहले गौ और अन्य जीव हत्या का कड़ा विरोध किया था।


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Wednesday, July 15, 2020

नाग पूजा कितनी लाभ दायक है?

नाग पंचमी क्यों बनाई जाती है।
हिन्दू धर्म में सावन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी का विशेष महत्व है। आदि काल से ही इस दिन नाग देवता की पूजा की जाती है और नागों को दूध पिलाया जाता है। इस दिन लोग नाग देवता के दर्शन को शुभ मानते हैं। ऐसी मान्यता है के इस दिन नाग देवता की पूजा करने से और उसे दूध पिलाने ने सारे बुरे प्रभाव दूर हो जाते हैं और नाग का भय भी दूर हो जाता है। नाग पंचमी की पूजा के प्रमाण हड़प्पा संस्कृति की पुरातत्व विभाग की खुदाई में भी मिले हैं।


हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार पृथ्वी को नागदेवता अपने सिर पर रखे हुए हैं। नाग देवता की पूजा का सिलसिला सदियों से चला आ रहा है। नाग देवता की पूजा करने से कई प्रकार के कुंडली में होने वाले दोषों से बचा जा सकता है। इसके लिए नागदेवता की पूरी विधि विधान से पूजा करनी चाहिए।

नागपंचमी के दिन ऐसे करें पूजा

इस दिन नागदेव के दर्शन अवश्य करना चाहिए। नाग देवता की बांबी (नागदेव का निवास स्थान) की पूजा करना चाहिए। नागदेवता पर दूध चढ़ा सकते हैं। उन्हें सुगंधित पुष्प व चंदन से ही पूजा करनी चाहिए। सर्वप्रथम सुबह जल्दी उठ कर स्नान करके नए वस्त्र धारण करने चाहिए। इसके पश्चात दीवार पर गोबर से पंचमुखी सांप बनाया जाता है। कुछ जगह गोबर के स्थान पर सोने चांदी तथा काठ की कलम से चन्दन की स्याही से पंचमुखी बना inया जाता है। इसी स्थान पर फिर दूध, चावल तथा पुष्प चढ़ाये जाते हैं और भोग लगाया जाता है। कुछ जगह लोग सांप के रहने के स्थान बांबी पर दूध चढ़ाया जाता है। तत्पश्चात नाग देवता की पूजा करके आरती की जाती है। सभी प्रकार के दुष्प्रभावों को दूर करने के लिए ॐ कुरुकुल्ये हूँ फट स्वाहा का जाप किया जाता है।
Naag pooja
नाग पंचमी की पूजा

काल सर्प का निवारण-

हमारे देश में विज्ञान के साथ-साथ अध्यात्म का भी अहम स्थान है। ऐसा माना जाता है के जिनकी कुंडली में काल सर्प दोष होता है उनको जीवन में नाग पंचमी की पूजा अवश्य करवानी चाहिए। इससे दोष भी दूर हो जाता है और जीवन में आने वाले अन्य विघ्न भी दूर हो जाते हैं। शिव पुराण में कहा गया है कि काल सर्प दोषयुक्त कुंडली वाला व्यक्ति यदि नागपंचमी पर नाग की पूजा करें और शिवजी पर सहस्राभिषेक करें तो सर्वमनोकामना सिद्धि प्राप्त होती है। एक और जहाँ पश्चिम बंगाल और ओड़िसा में इस दिन नाग देवी माँ मनसा की पूजा की जाती है वहीँ दूसरी और इस दिन केरला में नाग देवता की पूजा के साथ-साथ माँ सरस्वती की भी पूजा होती है। नाग पंचमी मुख्यतः मध्य,दक्षिण और पूर्वी भारत का प्रसिद्ध त्यौहार है।

नाग की पूजा करना  किसी भी धर्म ग्रन्थ में नही है ये मनमाना आचरण बताया गया है।
गीता जी अध्याय 16 श्लोक 23 ,24 में कहा गया जो साधक शास्त्र विधि को त्याग कर मनमाना आचरण करता है उसको न तो गति मिलती है और न ही कोई सुख शांति प्राप्त होती है और न ही मोक्ष मिलता है।फिर 24  में कहा गया है है अर्जुन  कर्तव्य और अकर्तव्य  की व्यवस्था में  शास्त्र ही प्रमाण है अथवा जो शास्त्रों में लिखा हुआ है वही कर।
नाग पंचम की साधना
सही भक्ति विधि साधना


गीत अध्याय 9 श्लोक 25 में कीलयर कहा गया है कि  देवताओ को पूजने वाले देवताओ  को प्राप्त होते हैं पितरो की पूजा करने वाले पितरों को प्राप्त होते हैं और भूतो की पूजा करने वाले भूतो को प्राप्त होते हैं   और मेरी भक्ति करने वाले  मुझे प्राप्त होंगे।(21  ब्रमांड का स्वामी काल भगवान अथवा तीनो देवताओ का पिता  ज्योति निरंजन कह रहा है)

‘‘गीता ज्ञान देने वाले ने अपनी भक्ति से होने वाली गति को अनुत्तमयानि घटिया क्यों कहा?’’ गीता अध्याय 7 श्लोक 16 से 18 तक पवित्रा गीता जी के बोलने वाले (ब्रह्म) काल प्रभु नेकहा कि मेरी भक्ति (ब्रह्म साधना) भी चार प्रकार के साधक करते हैं। एक तो अर्थार्थी (धन लाभचाहने वाले) जो वेद मंत्रों से ही जंत्रा-मंत्रा, हवन आदि करते रहते हैं। दूसरे आर्त्त (संकट निवार्ण केलिए वेदों के मंत्रों का जंत्रा-मंत्रा हवन आदि करते रहते हैं) तीसरे जिज्ञासु जो परमात्मा के ज्ञान कोजानने की इच्छा रखने वाले केवल ज्ञान संग्रह करके वक्ता बन जाते हैं तथा दूसरों में ज्ञानवान बनकर अभिमानवश भक्ति हीन हो जाते हैं, चौथे ज्ञानी। वे साधक जिनको यह ज्ञान हो गया कि मानव शरीर बार-बार नहीं मिलता, इससे प्रभु साधना नहीं की तो जीवन व्यर्थ हो जाएगा। उन्होंने वेदों को पढ़ा, जिनसे ज्ञान हुआ कि (ब्रह्मा-विष्णु-शिवजी) तीनों गुणों व ब्रह्म (क्षर पुरुष) तथा परब्रह्म (अक्षर पुरुष) से ऊपर पूर्ण ब्रह्म की ही भक्ति करनी चाहिए, अन्य प्रभुओं की नहीं।
सही भक्ति विधि
मनमाना आचरण

उन ज्ञानी उदार आत्माओं को मैं (काल ब्रह्म) अच्छा लगता हूँ तथा मुझे वे इसलिए अच्छे लगते हैं कि वेतीनों गुणों (रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु, तमगुण शिवजी) से ऊपर उठ कर मेरी (ब्रह्म) साधना तोकरने लगे जो अन्य देवताओं से अच्छी है परन्तु वेदों में ‘ओ3म्‘ नाम जो केवल ब्रह्म की साधना कामंत्रा है। उन ज्ञानी आत्माओं ने उसी को आप ही विचार - विमर्श करके पूर्ण ब्रह्म का मंत्रा जान करवर्षों तक साधना करते रहे। प्रभु प्राप्ति हुई नहीं। अन्य सिद्धियाँ प्राप्त हो गई। क्योंकि पवित्रा गीताअध्याय 4 श्लोक 34 तथा पवित्रा यजुर्वेद अध्याय 40 मंत्रा 10 में वर्णित तत्वदर्शी संत नहीं मिला, जो पूर्ण ब्रह्म की साधना तीन मंत्रा से बताता है। इसलिए ज्ञानी भी ब्रह्म (काल) साधना करके जन्म-मृत्यु के चक्र में ही रह गए क्योंकि गीता अध्याय 11 श्लोक 32 में गीता ज्ञान देने वाले ने कहाकि मैं काल हूँ। श्लोक 47.48 में कहा कि यह मेरा वास्तविक रूप है जिसको तेरे अतिरिक्त पहले किसी ने नहीं देखा है। मैंने तेरे पर अनुग्रह करके दर्शन दिए हैं। मेरे इस स्वरूप का दर्शन यानि काल ब्रह्म की प्राप्ति न तो वेदों का अध्ययन करने से, न यज्ञ यानि धार्मिक अनुष्ठान करने से, नदान से, न अन्य आध्यात्मिक क्रियाओं से, न उग्र तपों से हो सकती है यानि मैं देखा नहीं जा सकता हूँ। तेरे अतिरिक्त किसी को किसी भी साधना से मेरे दर्शन नहीं हो सकते। भावार्थ है किवेदों में वर्णित साधना से परमात्मा प्राप्ति नहीं होती।

गीता अध्याय 4 श्लोक 34 में गीता ज्ञान दाता ने  कहा है कि उस ज्ञान की परमात्मा  अपने मुख कमल से बोलकर सुनाता है जो तत्वज्ञान है उसको तत्वदर्शी   संतो के पास जाकर समझ उनको दवडवत प्रमाण  करने से कपट छोड़कर नम्रतापूर्वक प्रश्न करने से तत्वदर्शी संत तुजे तत्वज्ञान का उपदेश करेगे।

 Change yug
सत भक्ति करने से होगा महान परिवर्तन

» संत रामपाल जी महाराज का सर्व को संदेश » नाम कौन से राम का जपना है ?
नाम कौन से राम का जपना है ?

गीता जी के अध्याय नं. 15 का श्लोक नं. 16

द्वौ, इमौ, पुरुषौ, लोके, क्षरः, च, अक्षरः, एव, च, क्षरः, सर्वाणि, भूतानि, कूटस्थः, अक्षरः, उच्यते।।

अनुवाद: इस संसारमें दो प्रकारके भगवान हैं नाशवान और अविनाशी और ये सम्पूर्ण भूतप्राणियोंके शरीर तो नाशवान और जीवात्मा अविनाशी कहा जाता है।

गीता जी के अध्याय नं. 15 का श्लोक नं. 17

 उतमः, पुरुषः, तु, अन्यः, परमात्मा, इति, उदाहृतः, यः, लोकत्रायम् आविश्य, बिभर्ति, अव्ययः, ईश्वरः।।

अनुवाद: उत्तम भगवान तो अन्य ही है जो तीनों लोकोंमें प्रवेश करके सबका धारण-पोषण करता है एवं अविनाशी परमेश्वर परमात्मा इस प्रकार कहा गया है।

कबीर, अक्षर पुरुष एक पेड़ है, निरंजन वाकी डार।
त्रिदेवा (ब्रह्मा, विष्णु, शिव) शाखा भये, पात भया संसार।।
कबीर, तीन देवको सब कोई ध्यावै, चौथा देवका मरम न पावै।
चौथा छांडि पँचम ध्यावै, कहै कबीर सो हमरे आवै।।
कबीर, तीन गुणन की भक्ति में, भूलि पर्यौ संसार।
कहै कबीर निज नाम बिन, कैसे उतरै पार।।
कबीर, ओंकार नाम ब्रह्म (काल) का, यह कर्ता मति जानि।
सांचा शब्द कबीर का, परदा माहिं पहिचानि।।
कबीर, तीन लोक सब राम जपत है, जान मुक्ति को धाम।
रामचन्द्र वसिष्ठ गुरु किया, तिन कहि सुनायो नाम।।
कबीर, राम कृष्ण अवतार हैं, इनका नाहीं संसार।
जिन साहब संसार किया, सो किनहु न जनम्यां नारि।।
कबीर, चार भुजाके भजनमें, भूलि परे सब संत।
कबिरा सुमिरै तासु को, जाके भुजा अनंत।।
कबीर, वाशिष्ट मुनि से तत्वेता ज्ञानी, शोध कर लग्न धरै।
सीता हरण मरण दशरथ को, बन बन राम फिरै।।
कबीर, समुद्र पाटि लंका गये, सीता को भरतार।
ताहि अगस्त मुनि पीय गयो, इनमें को करतार।।
कबीर, गोवर्धन कृष्ण जी उठाया, द्रोणागिरि हनुमंत।
शेष नाग सब सृष्टी उठाई, इनमें को भगवंत।।
गरीब, दुर्वासा कोपे तहां, समझ न आई नीच।
छप्पन कोटि यादव कटे, मची रूधिर की कीच।।
कबीर, काटे बंधन विपति में, कठिन किया संग्राम।
चीन्हों रे नर प्राणियां, गरुड बडो की राम।।
कबीर, कह कबीर चित चेतहू, शब्द करौ निरुवार।
श्री रामचन्द्र को कर्ता कहत हैं, भूलि पर्यो संसार।।
कबीर, जिन राम कृष्ण निरंजन किया, सो तो करता न्यार।
अंधा ज्ञान न बूझई, कहै कबीर बिचार।।
कबीर, तीन गुणन (ब्रह्मा, विष्णु, शिव) की भक्ति में, भूल पड़यो संसार।
कहै कबीर निज नाम बिना, कैसे उतरो पार।।

शास्त्र अनुसार भक्ति
मनमाना आचरण करने से मोक्ष नही हो सकता

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Tuesday, July 7, 2020

सही शिक्षा क्या है ??

सही शिक्षा 
सही शिक्षा तो वही है जो सीखने वाले को आत्मनिर्भरता बना दे आत्मनिर्भरता से तात्पर्य यह है कि जीवन खुद सीखने वाला हो  वह खुद ऐसा बन जाए कि उसे खुद की अपनी जरूरत महसूस होने लगती है  कि मुझे अब क्या सीखना है और मुझे इस जीवन में जीने के लिए कौन सी बुक ओं का अध्ययन करना चाहिए यह आत्मा निभरता ही है

शिक्षा का महत्व
शिक्षा का ज्ञान


शिक्षा का स्तर खराब

व्यक्ति का शिक्षा का स्तर भी  दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा है  व्यक्ति शिक्षा प्राप्त करके दिन प्रतिदिन लाचारी बनता जा रहा है और शिक्षा  व्यक्ति को  इसलिए मिली है कि वह शिक्षा प्राप्त कर भगवान को पहचान सके और  सही मार्ग दर्शन कर सके जबकि  शिक्षा प्राप्त व्यक्ति आज एक दूसरे के प्रति घृणा तथा  दुराचारी बनता हुआ जा रहा है।



भगवान ने व्यक्ति को शिक्षा इसलिए दी गई थी  वह पढ़ लिख कर अपने सभी शब्द ग्रंथों को पहचान ले और भगवान का अस्तित्व को जान ले।

शिक्षा का अनमोल ज्ञान
शिक्षा का ज्ञान

उच्च शिक्षा प्राप्त कर किया हुआ व्यक्ति आज वह कई प्रकार के उपकरणों का प्रयोग कर रहा है जैसे कि गोले, बम का ऊपयोग कर व्यक्ति एक दूसरे दूसरे व्यक्ति का शत्रु   बनता जा रहा है।



अगर हम शिक्षा प्राप्त कर कर भी भगवान को नहीं पहचान सके  अथवा भगवान के  विधान को नहीं समझे तो हमारे उच्च शिक्षा का कोई भी लाभ नहीं है।


मानव जीवन में अगर हम पढ़  लिख कर भी भगवान को नहीं पहचाना सके तो हमारी शिक्षा को  धिक्कार है।
शिक्षा का उदेश्य परमात्मा को पहचान
परमात्मा का ज्ञान को जानना


शिक्षा का उद्देश्य

व्यक्ति को शिक्षा का उद्देश्य इसलिए अहम है कि वह अपने लिखिए सद्ग्रन्थों के लिखे गूढ़ रहस्यों को जानने के लिए   व्यक्ति को शिक्षा मिली है   हुआ व्यक्ति  व्यक्ति  परमात्मा के गूढ रहस्यों को जान सके कि परमात्मा कौन है तथा कैसे मिलता है तथा उसको पाने की विधि  क्या है।

उच्चकेवल ये ही व्यक्ति को  शिक्षा पाने का अधिकार है 
आज यक्ति शिक्षा ग्रहण कर  इंसानियत भूल कर बैठा है ।
परमात्मा को पहचान
परमात्मा के ज्ञान की खोज करना

शिक्षा प्राप्त हुआ व्यक्ति परमात्मा   के विधान से परिचित हो जाता है और  और वह परमात्मा से  डरने वाला  होता है और वह सही कर्म करने लगता है।

आए जानते हैं कि वह कौन है  तथा उसके पाने की  विधि क्या?
परमात्मा की जानकारी केवल संत रामपाल जी महाराज जी के बता  सकते हैं अपने सभी सद्ग्रन्थों के अनुसार  परमात्मा कबीर साहेब जी है।


पूर्ण परमात्मा कबीर
पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब जी है।

अधिक जानकारी के लिए अवश्य देखें संत रामपाल जी महाराज के मंगल प्रवचन 

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