Wednesday, August 5, 2020

भैया दूज क्या है??

भाई दूज
       राखी के बाद मनाया जाता है। पहले दीपावली उसके अगले दिन गोवर्धन पूजा और फिर भाई दूज मनाया जाता है।
Bhai Dooj के दिन बहनें भाई के माथे पर कुमकुम का तिलक लगा कर उसकी आरती करती हैं। भाई दूज का मनमाना पर्व बहन के अपने भाई के प्रति प्रेम को अभिव्यक्त करता है एवं बहनें इस दिन अपने भाई की खुशहाली के लिए ईश्वर से कामना करती हैं। यह पर्व रक्षाबंधन की तरह ही मनाया जाता है।

गीता जी हमारा प्रमुख सदग्रंथ है। सतभक्ति की प्रबल इच्छा रखने वाले साधकों को गीता जी व वेदों को आधार बनाकर भक्ति करनी चाहिए।
भैया दूज
भैया दूज की पूजा क्या है?

 वेदों अनुसार साधना न करने वाले मनुष्य पूर्ण मुक्त नहीं होते।।

पवित्र गीता अध्याय 9 के श्लोक 23, 24 में कहा है कि जो व्यक्ति अन्य देवी-देवताओं को पूजते हैं वे भी मेरी काल की पूजा ही कर रहे हैं। परंतु उनकी यह पूजा अविधिपूर्वक यानि शास्त्रविरूद्ध है (देवी-देवताओं को नहीं पूजना चाहिए) क्योंकि सम्पूर्ण यज्ञों का भोक्ता व स्वामी मैं ही हूँ। वे भक्त मुझे अच्छी तरह नहीं जानते कि यह काल है। इसलिए इसकी पूजा करके भी पतन को प्राप्त होते हैं जिससे नरक व चौरासी लाख जूनियों का कष्ट सदा बना रहता है। जैसे गीता अध्याय 3 श्लोक 14-15 में कहा है कि सर्व यज्ञों में प्रतिष्ठित अर्थात् सम्मानित, जिसको यज्ञ समर्पण की जाती है वह परमात्मा (सर्व गतम् ब्रह्म) पूर्ण ब्रह्म है। वही कर्माधार बना कर सर्व प्राणियों को प्रदान करता है। परन्तु पूर्ण सन्त न मिलने तक सर्व यज्ञों का भोग (आनन्द) काल (मन रूप में) ही भोगता है, इसलिए कह रहा है कि मैं सर्व यज्ञों का भोक्ता व स्वामी हूँ।
सद्ग्रन्थों का ज्ञान
 सदग्रंथों का ज्ञान

श्राद्ध निकालने (पितर पूजने) वाले पितर बनेंगे, उनकी मुक्ति नहीं होती तो गंगा – यमुना में स्नान करने वालों की कैसे हो सकती है!

वेदों ओर गीता जी में केवल एक पूर्ण परमात्मा की पूजा का ही विधान है, अन्य देवताओं, पितरों, भूतों की पूजा करना मना है। पुराणों में ऋषियों का आदेश है। जिनकी आज्ञा पालन करने से प्रभु का संविधान भंग होने के कारण कष्ट पर कष्ट उठाना पड़ेगा। इसलिए आन उपासना पूर्ण मोक्ष में बाधक है। और यमराज कोई पूर्ण परमात्मा नहीं है जिसकी पूजा अर्चना से कोई लाभ मिल सके। मोक्ष प्राप्त करने के लिए भाई बहन को यमुना स्नान करने से नहीं बल्कि तत्वज्ञान को समझ कर विधिवत् तत्वदर्शी संत से नाम दीक्षा सतभक्ति करनी होगी और तीन चरणों में दिए जाने वाले मोक्ष मंत्र के जाप से मुक्ति होगी।

भाई दूज  ये मनमाना आचरण है इसे  की मनाने से भाई अपनी बहन की रक्षा नही कर पाता है और आज हमारे सामने लाखो उदाहरण है कि भैया दूज पर व्यक्ति अकाल मृत्यु को प्राप्त हो रहे हैं अगर इस को मनाने से हमारी रक्षा होती है तो फिर ये संकट क्यों आ रहे हैं ।

ऐसे उदाहरणों से स्पस्ट है कि ये  मनमानी भक्ति साधना है इसको करने से यक्ति को किसी किसी भी  प्रकार का दुःखो का निवारण नही हो सकता है।
कबीर साहेब जी  भक्ति
शास्त्र विरूद्ध साधना करने से जीव का मोक्ष नही हो सकता।

अज्ञानतावश लोग करते हैं यम की पूजा
         पद्म पुराण के अनुसार कार्तिक शुक्लपक्ष की द्वितीया को पूर्वाह्न में यम की पूजा करके यमुना में स्नान करने वाला मनुष्य यमलोक को नहीं जाता (अर्थात उसको मुक्ति प्राप्त हो जाती है)।
मथुरा में यमराज का मंदिर है। लोकवेद के अनुसार यहां पर भाई-बहन यमराज की पूजा करते हैं। ये पूजा यम्-द्वितीया पर होती है। मथुरा के विश्राम घाट पर एक विशेष स्नान होता है, जिसमें लाखों भाई-बहन इस मनोकामना के साथ मिलकर यमुना के जल में स्नान करते हैं कि वह अपने पापों से मुक्त होंगे और मोक्ष प्राप्त करेंगे।
विचार कीजिए यदि ऐसा होता तो यमुना के जल में रहने वाले जीव जंतु तो सीधे मोक्ष को प्राप्त होंगे क्योंकि वह तो दिन रात उसी जल में रहते हैं । मनुष्य जल में स्नान करके उसमें रहने वाले लाखों जीवों की हत्या अनजाने में ही कर देता है जिसका पाप उसके सिर यानी कर्मों में जोड़ दिया जाता है। ऐसे में मोक्ष की परिकल्पना भी नहीं की जा सकती।

कबीर भगवान हमारी रक्षा कर सकता है।

भैया दूज का पर्व 84 लाख योनियां नहीं छुड़ा सकता
पुराणों पर आधारित रहकर भक्ति कर्म करने वाले का मोक्ष तो बहुत दूर की बात है वह तो 84 लाख योनियों में जन्म मृत्यु से भी पीछा नहीं छुड़ा पाता। एक दिन यमुना में स्नान करने से पाप धुल जाते तो लोग 33 करोड़ देवी-देवताओं की पूजा क्यों करते हैं।
।।उत्तम धर्म जो कोई लखि पाये। आप गहैं औरन बताय।।

 

तातें सत्यपुरूष हिये हर्षे। कृपा वाकि तापर बर्षे।।

जो कोई भूले राह बतावै। परम पुरूष की भक्ति में लावै।।

ऐसो पुण्य तास को बरणा। एक मनुष्य प्रभु शरणा करना।।

कोटि गाय जिनि गहे कसाई। तातें सूरा लेत छुड़ाई।।

एक जीव लगे जो परमेश्वर राह। लाने वाला गहे पुण्य अथाह।।

भावार्थ परमेश्वर कबीर जी कहते हैं कि एक मानव (स्त्री-पुरूष) उत्तम धर्म यानि शास्त्र अनुकूल धर्म-कर्म में पूर्ण संत की शरण में आता है औरों को भी राह (मार्ग) बताता है। उसको परमेश्वर हृदय से प्रसन्न होकर प्रेम करता है। जो कोई एक जीव को परमात्मा की शरण में लगाता है तो उसको बहुत पुण्य होता है। एक गाय को कसाई से छुड़वाने का पुण्य एक यज्ञ के तुल्य होता है। करोड़ गायों को छुड़वाने जितना पुण्य होता है, उतना पुण्य एक जीव को काल से हटाकर पूर्ण परमात्मा की शरण में लगाने का मध्यस्थ को होता है। भाई बहन और अन्यों को शीघ्र गलत साधना भक्ति त्याग कर सतभक्ति आरंभ करनी चाहिए।

जो लोग  पूर्ण परमात्मा की सतभक्ति नही करते हैं उनको नरक लोक  में बहुत सी यातनाए सहन करनी पड़ती है और फिर 84 लाख प्रकार की योनिया धर्म राज के द्वारा भोगनी पड़ती है ।केवल सतभक्ति से व्यक्ति की ये 84 लाख प्रकार की योनियों में जाने से बच सकता है।


गीता में मनमाना आचरण करने वालों को मूर्ख कहा है
ज़रा सोचिए जो आदमी दूसरे की बहन, बेटी या बीवी का बलात्कार करेगा क्या वह भी इस तरह के स्नान के बाद नरक जाने से बच पाएगा। जो अपनी बहन के अलावा दूसरे की बहन , बेटी पर बुरी नज़र रखते हैं क्या वह भी नरक जाने से बच पाएंगे।
गीता अ.16 के श्लोक 23 में शास्त्र विरुद्ध भक्ति के लिए मना किया गया है।
सभी प्रचलित तीज त्यौहार मनमाना आचरण और लोकवेद पर आधारित हैं।


अपने किसी भी धर्म के सद्ग्रन्थों में नही लिखा हुआ कि इस तरह की पूजा व भक्ति करने से जीव का कल्याण हो सकता है।
   जबकि अपने धर्म ग्रन्थों में शास्त्र विरूद्ध साधना को लताड़ा है।


आज वर्तमान समय मे केवल संत रामपाल जी महाराज ही शास्त्र अनुकूल भक्ति साधना बता रहे हैं जिसे व्यक्ति को सुख व मोक्ष की प्राप्ति होगी ।
तत्वदर्शी संत की जानकारी
तत्वज्ञान

अधिक जानकारी के लिए  अवश्य देखे सत्संग।
साधना टीवी पर
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8:30से9:30pm

Friday, July 31, 2020

मांस खाना महापाप है।

मांस खाना हराम है।

  • मांस खाने का आदेश अल्लाह का नहीं है। न ही कुरान शरीफ़ में इसके खाने का ज़िक्र अल्लाह ने स्वयं किया। जो वेद या ग्रंथ मांस खाने को कहे वह परमात्मा का ज्ञान हो ही नहीं सकता। ऐसा तो केवल कोई शैतान ही ज़बरदस्ती करवाता है। आपको बता दें कि मुसलमानों की सबसे पवित्र किताब कुरान है जिसे पूरा मुस्लिम समाज मानता है।महत्वपूर्ण बात यह है कि परमात्मा ने इसमें मांस खाने का कहीं कोई आदेश नही है।

            मांस खाने का आदेश जिब्राइल फरिश्ते का था जिसे मुस्लिम भाई परमात्मा का फरमान मान बैठे और पाप के गर्त में डूब गए। पूरे दिन भूखे प्यासे रह कर पांच वक्त की नमाज़ पढ़ते हुए अल्लाह से अपने गुBनाहों की माफ़ी मांगते हो।
एक तरफ तो इबादत करते है  दूसरी तरफ अल्लाह के बच्चों का हल्लाह करते हो तो वह अल्लाह कैसे खुश हो  सकता है?
और न ही मांस खाना किसी भी धर्म ग्रन्थ में  है। जो व्यक्ति मांस खा रहा है वह परमात्मा के विधान को तोड़  रहा है।

खून खराबा करना  महापाप
खून खराबा करना अल्लाह कबीर जी का आदेश नही है।
  • हजरत मोहम्मद जी ने कभी मांस नही खाया फिर आज का मुसलमान धर्म क्यों  खा रहा है।

हजरत मुहम्मद जी जिस साधना को करता था वही साधना अन्य मुसलमान समाज भी
कर रहा है। वर्तमान में सर्व मुसलमान श्रद्धालु माँस भी खा  रहे ह परन्तु नबी मुहम्मद जी ने  माँस नहीं खाया तथा न ही उनके सीधे अनुयाईयों(एक लाख अस्सी हजार) ने माँस खाया।
केवल रोजा व बंग तथा नमाज किया करते थे। गाय आदि को बिस्मिल(हत्या) नहीं करते थे।
नबी मुहम्मद नमस्कार है, राम रसूल कहाया।
एक लाख अस्सी कूं सौगंध, जिन नहीं करद चलाया।।
अरस कुरस पर अल्लह तख्त है, खालिक बिन नहीं खाली।
वे पैगम्बर पाख पुरुष थे, साहिब के अब्दाली।।


भावार्थ :- नबी मोहम्मद तो आदरणीय है जो प्रभु के अवतार कहलाए हैं। कसम है एक लाख
अस्सी हजार को जो उनके अनुयाई थे उन्होंने भी कभी बकरे, मुर्गे तथा गाय आदि पर करद
नहीं चलाया अर्थात् जीव हिंसा नहीं की तथा माँस भक्षण नहीं किया। वे हजरत मोहम्मद, हजरत
मूसा, हरजत ईसा आदि पैगम्बर(संदेशवाहक) तो पवित्रा व्यक्ति थे तथा ब्रह्म(ज्योति निरंजन/काल)
के कृपा पात्रा थे, परन्तु जो आसमान के अंतिम छोर(सतलोक) में पूर्ण परमात्मा(अल्लाहू अकबर
अर्थात् अल्लाह कबीर) है उस सृष्टी के मालिक की नजर से कोई नहीं बचा।

मारी गऊ शब्द के तीरं, ऐसे थे मोहम्मद पीरं।।
शब्दै फिर जिवाई, हंसा राख्या माँस नहीं भाख्या, एैसे पीर मुहम्मद भाई।।

 भावार्थ : एक समय नबी मुहम्मद ने एक गाय को शब्द(वचन सिद्धि) से मार कर सर्व के
सामने जीवित कर दिया था। उन्होंने गाय का माँस नहीं खाया। अब मुसलमान समाज
वास्तविकता से परिचित नहीं है। जिस दिन गाय जीवित की थी उस दिन की याद बनाए रखने
के लिए गऊ मार देते हो। आप जीवित नहीं कर सकते तो मारने के भी अधिकारी नहीं हो।
आप माँस को प्रसाद रूप जान कर खाते तथा खिलाते हो। आप स्वयं भी पाप के भागी बनते
हो तथा अनुयाईयों को भी गुमराह कर रहे हो। आप दोजख (नरक) के पात्रा बन रहे हो।


  •  कबीर अल्लाह ने मांस खाने वालर व्यक्तियों के बारे में बताया है।


जो व्यक्ति माँस खाते हैं,
शराब पीते हैं, सत्संग सुनकर भी बुराई नहीं त्यागते, उपदेश प्राप्त नहीं करते, उन्हें तो साक्षात
राक्षस जानों। अनजाने में गलती न जाने किससे हो जाए। यदि वह बुराई करने वाला व्यक्ति
सत्संग विचार सुनकर बुराई त्याग कर भगवान की भक्ति करने लग जाता है वह तो नेक आत्मा
है, वह चाहे किसी जाति व धर्म का हो। जो माँस आहार तथा सुरा पान त्याग कर प्रभु भक्ति
नहीं करता वह तो ढेड(नीच) व्यक्ति है, चाहे किसी जाति या धर्म का हो। भावार्थ है कि उच्च
कर्म करने वाला उच्च है तथा नीच कर्म करने वाला नीच है। जाति या धर्म विशेष में जन्म मात्रा
से उच्च-नीच नहीं होता। जिन साधकों ने उपदेश ले रखा है उन्हें उपरोक्त प्रकार के बुराई
करने वालों के पास नहीं बैठना चाहिए, जिससे आपकी भक्ति में बाधा पड़ेगी।
जो व्यक्ति माँस भक्षण करते हैं, शराब पीते हैं, जो स्त्रा वैश्यावृति करती है तथा जो व्यक्ति
उससे व्यवसाय करवा कर वैश्या से धन प्राप्त करते हैं, जुआ खेलते हैं तथा चोरी करते है,
समझाने से भी नहीं मानते, वह तो महापाप के भागी हैं तथा घोर नरक में गिरेंगे।
माँस चाहे गाय, हिरनी तथा मुर्गी आदि किसी प्राणी का है जो व्यक्ति माँस खाते हैं वे नरक
के भागी हैं। जो व्यक्ति अनजाने में माँस खाते हैं(जैसे आप किसी रिश्तेदारी में गए, आपको
पता नहीं लगा कि सब्जी है या माँस, आपने खा लिया) तो आप को दोष नहीं, परन्तु आगे से
अति सावधान रहना। जो व्यक्ति आँखों देखकर भी खा जाते हैं वे दोषी हैं। यह माँस तो कुत्ते
का आहार है, मनुष्य शरीर धारी के लिए वर्जित है।
जो गुरुजन माँस भक्षण करते हैं तथा शराब पीते हैं उनसे नाम दीक्षा प्राप्त करने वालों की
मुक्ति नहीं होती अपितु महा नरक के भागी होंग।
जो व्यक्ति जीव हिंसा करते हैं (चाहे गाय, सूअर, बकरी, मुर्गी, मनुष्य, आदि किसी भी
प्राणी को स्वार्थवश मारते हैं) वे महापापी हैं, (भले ही जिन्होंने पूर्ण संत से पूर्ण परमात्मा का
उपदेश भी प्राप्त है) वे कभी मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकते ।।
     

जीव हत्या महापाप
बेजुबानों जीवो की हत्या करने से अल्लाह कभी खुश नही होता है।

बकरी जो आपने मार डाली वह तो घास-फूंस, पत्ते आदि खाकर पेट भर रही थी। इस काल
लोक में ऐसे शाकाहारी पशु की भी हत्या हो गई तो जो बकरी का माँस खाते हैं उनका तो
अधिक बुरा हाल होगा(साखी 18)।
पशु आदि को हलाल, बिस्मिल आदि करके माँस खाने व प्रसाद रूप में वितरित करने का
आदेश दयालु (करीम) प्रभु का कब प्राप्त हुआ(क्योंकि पवित्रा बाईबल उत्पत्ति ग्रन्थ में पूर्ण
परमात्मा ने छः दिन में सृष्टी रची, सातवें दिन ऊपर तख्त पर जा बैठा तथा सर्व मनुष्यों के
आहार के लिए आदेश किया था कि मैंने तुम्हारे खाने के लिए फलदार वृक्ष तथा बीजदार पौधे
दिए हैं।



  •  उस करीम (दयालु प्रभु पूर्ण परमात्मा) की ओर से आप को फिर से कब आदेश हुआ? वह कौन-सी कुआर्न में लिखा है ? पूर्ण परमात्मा सर्व मनुष्यों आदि की सृष्टी रचकर ब्रह्म(जिसेअव्यक्त कहते हो, जो कभी सामने प्रकट नहीं होता, गुप्तकार्य करता तथा करवाता रहता है)को दे गया।


 बाद में पवित्रा बाईबल तथा पवित्रा कुआर्न शरीफ आदि ग्रन्थों में जो विवरण है वह
ब्रह्म (काल/ज्योति निरंजन) का तथा उसके फरिश्तों का है, या भूतों-प्रेतों का है। करीम अर्थात्
पूर्ण ब्रह्म दयालु अल्लाहु कबीरू का नहीं है। उस पूर्ण ब्रह्म के आदेश की अवहेलना किसी भी
फरिश्ते व ब्रह्म आदि के कहने से करने की सजा भोगनी पड़ेगी।)
एक समय एक व्यक्ति की दोस्ती एक पुलिस थानेदार से हो गई। उस व्यक्ति ने अपने दोस्त
थानेदार से कहा कि मेरा पड़ोसी मुझे बहुत परेशान करता है। थानेदार कहा कि मार
लट्ठ, मैं आप निपट लूंगा। थानेदार दोस्त की आज्ञा का पालन करके उस व्यक्ति ने अपने पड़ोसी
को लट्ठ मारा, सिर में चोट लगने के कारण पड़ौसी की मृत्यु हो गई। उसी क्षेत्रा का अधिकारी होने
के कारण वह थाना प्रभारी अपने दोस्त को पकड़ कर लाया, कैद में डाल दिया तथा उस व्यक्ति को
मृत्यु दण्ड मिला। उसका दोस्त थानेदार कुछ मदद नहीं कर सका। क्योंकि राजा का संविधान है
कि यदि कोई किसी की हत्या करेगा तो उसे मृत्यु दण्ड प्राप्त होगा। उस नादान व्यक्ति ने अपने
मित्रा दरोगा की आज्ञा मान कर राजा का संविधान भंग कर दिया। जिससे जीवन से हाथ धो बैठा।
ठीक इसी प्रकार पूर्ण परमात्मा की आज्ञा की अवहेलना करने वाला पाप का भागी होगा।
क्योंकि कुआर्न शरीफ (मजीद) का सारा ज्ञान ब्रह्म (काल/ज्योति निरंजन, जिसे आप अव्यक्त
कहते हो) का दिया हुआ है। इसमें उसी का आदेश है तथा पवित्रा बाईबल में केवल उत्पत्ति ग्रन्थ के
प्रारम्भ में पूर्ण प्रभु का आदेश है। पवित्रा बाईबल में हजरत आदम तथा उसकी पत्नी हव्वा को उस
पूर्ण परमात्मा ने बनाया। बाबा आदम की वंशज संतान हजरत ईस्राईल, राजा दऊद, हजरत मूसा,
हजरत ईसा तथा हजरत मुहम्मद आदि को माना है। पूर्ण परमात्मा तो छः दिन में सृष्टी रचकर
तख्त पर विराजमान हो गया। बाद का सर्व कतेबों (कुआर्न शरीफ आदि) का ज्ञान ब्रह्म
(काल/ज्योति निरंजन) का प्रदान किया हुआ है।

बेजुबानों की हत्या
जीव हत्या करना हराम है।

पवित्रा कुआर्न का ज्ञान दाता स्वयं कहता है कि
पूर्ण परमात्मा जिसे करीम, अल्लाह कहा जाता है उसका नाम कबीर है, वही पूजा के योग्य उसके तत्वज्ञान व भक्ति विधि को किसी बाखबर (तत्वदर्शी संत) से पता करो। इससे सिद्ध है कि
जो ज्ञान कुआर्न शरीफ आदि का है वह पूर्ण प्रभु का नहीं है (साखी
जब काजी के पुत्रा की मृत्यु हो जाती है तो काजी को कितना कष्ट होता है। पूर्ण ब्रह्म(अल्लाह
कबीर) सर्व का पिता है। उसके प्राणियों को मारने वाले से अल्लाह खुश नहीं होता
दर्द सर्व को एक जैसा ही होता है। अनजान नहीं जानते। यदि बकरे आदि का गला काट कर
(हलाल करके) उसे स्वर्ग भेज देते हो तो काजी तथा मुल्ला अपना गला छेदन करके (हलाल करके)
स्वर्ग प्राप्ति क्यों नहीं करते ?
जिस समय बकरी को मुल्ला मारता है तो वह बेजुबान प्राणी आँखों में आंसू भर कर म्यां-म्यां
करके समझाना चाहता है कि हे मुल्ला मुझे मार कर पाप का भागी मत बन। जब परमेश्वर के न्याय
अनुसार लेखा किया जाएगा उस समय तुझे बहुत संकट का सामना करना पड़ेगा।
जबरदस्ती (बलात्) निर्दयता से बकरी आदि प्राणी को मारते हो, कहते हो हलाल कर रहे हैं।
इस दोगली नीति का आपको महा कष्ट भोगना होगा। काजी तथा मुल्ला व कोई भी जीव हिंसा
करने वाला पूर्ण प्रभु के कानून का उल्लंघन कर रहा है, जिस कारण वहाँ धर्मराज के दरबार में
खड़ा-खड़ा पिटेगा। यदि हलाल ही करने का शौक है तो काम, क्रोध, मोह, अहंकार, लोभ आदि को
कर।
पाँच समय निमाज भी पढ़ते हो तथा रोजों के समय रोजे (व्रत) भी रखते हो। शाम को गाय,
बकरी, मुर्गी आदि को मार कर माँस खाते हो। एक तरफ तो परमात्मा की स्तुति करते हो दूसरी
ओर उसी के प्राणियों की हत्या करते हो। ऐसे प्रभु कैसे खुश होगा ? अर्थात् आप स्वयं भी पाप के
भागी हो रहे हो तथा अनुयाईयों को भी गुमराह करने के दोषी होकर नरक में गिरोगे।
कबीर परमेश्वर कह रहे हैं कि हे काजी, मुल्लाओं आप पीर (गुरु) भी कहलाते हो। पीर तो वह
होता है जो दूसरे के दुःख को समझे उसे, संकट में गिरने से बचाए। किसी को कष्ट न पहुँचाए। जो
दूसरे के दुःख में दुःखी नहीं होता वह तो काफिर (नीच) बेपीर (निर्दयी) है। वह पीर (गुरु) के योग्य
नहीं है।
उत्तम खाना नमकीन खिचड़ी है उसे खाओ। दूसरे का गला काटने वाले को उसका बदला देना
पड़ता है। यह जान कर समझदार व्यक्ति प्रतिफल में अपना गला नहीं कटाता। दोनों ही धर्मों के
मार्ग दर्शक निर्दयी हो चुके हैं। हिन्दूओं के गुरु कहते हैं कि हम तो एक झटके से बकरा आदि का
गला छेदन करते हैं, जिससे प्राणी को कष्ट नहीं होता, इसलिए हम दोषी नहीं हैं तथा मुसलमान
धर्म के मार्ग दर्शक कहते हैं हम धीरे-धीरे हलाल करते हैं जिस कारण हम दोषी नहीं। परमात्मा
कबीर साहेब जी ने कहा यदि आपका तथा आपके परिवार के सदस्य का गला किसी भी विधि से
काटा जाए तो आपको कैसा लगेगा ?
बात करते हैं पुण्य की, करते हैं घोर अधर्म।
दोनों नरक में पड़हीं, कुछ तो करो शर्म।।


गाय की हत्या महापाप
जीव हिंसा महापाप

कबीर परमेश्वर ने कहा -

हम मुहम्मद को सतलोक ले गया। इच्छा रूप वहाँ नहीं रहयो। उल्ट मुहम्मद महल पठाया, गुज बीरज एक  कलमा लाया।। रोजा, बंग, नमाज दई रे, बिसमिल की नहीं बात कही रे।
भावार्थ :- नबी मुहम्मद को मैं(कबीर परमेश्वर) सतलोक ले कर गया था परन्तु वहाँ न रहने
की इच्छा व्यक्त की, वापिस मुहम्मद जी को शरीर में भेज दिया। नबी मुहम्मद जी ने रोजा(व्रत)
बंग(ऊँची आवाज में प्रभु स्तुति करना) तथा पाँच समय की नमाज करना तो कहा था परन्तु
गाय आदि प्राणियों को बिस्मिल करने(मारने) को नहीं कहा।


रोजा बंग नमाज दई रे , बिस्मिल की नहीं बात कही रे “ मोहम्मद जी का केवल इतना ही आदेश था।उन्होंने गाय कभी बिस्मिल नहीं की।
हज़रत मुहम्मद जी ने कभी मांस नहीं खाया, न खाने का आदेश दिया। इन क़ाज़ी, मुल्लाओं ने, फरिश्तों ने डरा धमकाकर कर किसी के शरीर में प्रवेश करके ये सब गलत अफवाएं फैलाई। हज़रत मुहम्मद जी ने तो अपनी सिद्धि से एक मरी हुई गाय जीवित करी थी।

नबी मुहम्मद नमस्कार है राम रसूल कहाया 1लाख 80 को सौगंध जिन नहीं करद चलाया।
अरस कुरस पर अल्लह तख्त है खालिक बिन नहीं खाली।
वे पैगंबर पाक़ पुरुष थे, साहिब के अब्दाली।”

नबी मुहम्मद जी तो परमात्मा की बहुत नेक आत्मा थीं। उन्होंने कभी मांस नहीं खाया, न अपने 1,80,000 शिष्यों को खाने को कहा।
कबीर साहेब जी ने भी 600 वर्ष पहले गौ और अन्य जीव हत्या का कड़ा विरोध किया था।


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Wednesday, July 15, 2020

नाग पूजा कितनी लाभ दायक है?

नाग पंचमी क्यों बनाई जाती है।
हिन्दू धर्म में सावन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी का विशेष महत्व है। आदि काल से ही इस दिन नाग देवता की पूजा की जाती है और नागों को दूध पिलाया जाता है। इस दिन लोग नाग देवता के दर्शन को शुभ मानते हैं। ऐसी मान्यता है के इस दिन नाग देवता की पूजा करने से और उसे दूध पिलाने ने सारे बुरे प्रभाव दूर हो जाते हैं और नाग का भय भी दूर हो जाता है। नाग पंचमी की पूजा के प्रमाण हड़प्पा संस्कृति की पुरातत्व विभाग की खुदाई में भी मिले हैं।


हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार पृथ्वी को नागदेवता अपने सिर पर रखे हुए हैं। नाग देवता की पूजा का सिलसिला सदियों से चला आ रहा है। नाग देवता की पूजा करने से कई प्रकार के कुंडली में होने वाले दोषों से बचा जा सकता है। इसके लिए नागदेवता की पूरी विधि विधान से पूजा करनी चाहिए।

नागपंचमी के दिन ऐसे करें पूजा

इस दिन नागदेव के दर्शन अवश्य करना चाहिए। नाग देवता की बांबी (नागदेव का निवास स्थान) की पूजा करना चाहिए। नागदेवता पर दूध चढ़ा सकते हैं। उन्हें सुगंधित पुष्प व चंदन से ही पूजा करनी चाहिए। सर्वप्रथम सुबह जल्दी उठ कर स्नान करके नए वस्त्र धारण करने चाहिए। इसके पश्चात दीवार पर गोबर से पंचमुखी सांप बनाया जाता है। कुछ जगह गोबर के स्थान पर सोने चांदी तथा काठ की कलम से चन्दन की स्याही से पंचमुखी बना inया जाता है। इसी स्थान पर फिर दूध, चावल तथा पुष्प चढ़ाये जाते हैं और भोग लगाया जाता है। कुछ जगह लोग सांप के रहने के स्थान बांबी पर दूध चढ़ाया जाता है। तत्पश्चात नाग देवता की पूजा करके आरती की जाती है। सभी प्रकार के दुष्प्रभावों को दूर करने के लिए ॐ कुरुकुल्ये हूँ फट स्वाहा का जाप किया जाता है।
Naag pooja
नाग पंचमी की पूजा

काल सर्प का निवारण-

हमारे देश में विज्ञान के साथ-साथ अध्यात्म का भी अहम स्थान है। ऐसा माना जाता है के जिनकी कुंडली में काल सर्प दोष होता है उनको जीवन में नाग पंचमी की पूजा अवश्य करवानी चाहिए। इससे दोष भी दूर हो जाता है और जीवन में आने वाले अन्य विघ्न भी दूर हो जाते हैं। शिव पुराण में कहा गया है कि काल सर्प दोषयुक्त कुंडली वाला व्यक्ति यदि नागपंचमी पर नाग की पूजा करें और शिवजी पर सहस्राभिषेक करें तो सर्वमनोकामना सिद्धि प्राप्त होती है। एक और जहाँ पश्चिम बंगाल और ओड़िसा में इस दिन नाग देवी माँ मनसा की पूजा की जाती है वहीँ दूसरी और इस दिन केरला में नाग देवता की पूजा के साथ-साथ माँ सरस्वती की भी पूजा होती है। नाग पंचमी मुख्यतः मध्य,दक्षिण और पूर्वी भारत का प्रसिद्ध त्यौहार है।

नाग की पूजा करना  किसी भी धर्म ग्रन्थ में नही है ये मनमाना आचरण बताया गया है।
गीता जी अध्याय 16 श्लोक 23 ,24 में कहा गया जो साधक शास्त्र विधि को त्याग कर मनमाना आचरण करता है उसको न तो गति मिलती है और न ही कोई सुख शांति प्राप्त होती है और न ही मोक्ष मिलता है।फिर 24  में कहा गया है है अर्जुन  कर्तव्य और अकर्तव्य  की व्यवस्था में  शास्त्र ही प्रमाण है अथवा जो शास्त्रों में लिखा हुआ है वही कर।
नाग पंचम की साधना
सही भक्ति विधि साधना


गीत अध्याय 9 श्लोक 25 में कीलयर कहा गया है कि  देवताओ को पूजने वाले देवताओ  को प्राप्त होते हैं पितरो की पूजा करने वाले पितरों को प्राप्त होते हैं और भूतो की पूजा करने वाले भूतो को प्राप्त होते हैं   और मेरी भक्ति करने वाले  मुझे प्राप्त होंगे।(21  ब्रमांड का स्वामी काल भगवान अथवा तीनो देवताओ का पिता  ज्योति निरंजन कह रहा है)

‘‘गीता ज्ञान देने वाले ने अपनी भक्ति से होने वाली गति को अनुत्तमयानि घटिया क्यों कहा?’’ गीता अध्याय 7 श्लोक 16 से 18 तक पवित्रा गीता जी के बोलने वाले (ब्रह्म) काल प्रभु नेकहा कि मेरी भक्ति (ब्रह्म साधना) भी चार प्रकार के साधक करते हैं। एक तो अर्थार्थी (धन लाभचाहने वाले) जो वेद मंत्रों से ही जंत्रा-मंत्रा, हवन आदि करते रहते हैं। दूसरे आर्त्त (संकट निवार्ण केलिए वेदों के मंत्रों का जंत्रा-मंत्रा हवन आदि करते रहते हैं) तीसरे जिज्ञासु जो परमात्मा के ज्ञान कोजानने की इच्छा रखने वाले केवल ज्ञान संग्रह करके वक्ता बन जाते हैं तथा दूसरों में ज्ञानवान बनकर अभिमानवश भक्ति हीन हो जाते हैं, चौथे ज्ञानी। वे साधक जिनको यह ज्ञान हो गया कि मानव शरीर बार-बार नहीं मिलता, इससे प्रभु साधना नहीं की तो जीवन व्यर्थ हो जाएगा। उन्होंने वेदों को पढ़ा, जिनसे ज्ञान हुआ कि (ब्रह्मा-विष्णु-शिवजी) तीनों गुणों व ब्रह्म (क्षर पुरुष) तथा परब्रह्म (अक्षर पुरुष) से ऊपर पूर्ण ब्रह्म की ही भक्ति करनी चाहिए, अन्य प्रभुओं की नहीं।
सही भक्ति विधि
मनमाना आचरण

उन ज्ञानी उदार आत्माओं को मैं (काल ब्रह्म) अच्छा लगता हूँ तथा मुझे वे इसलिए अच्छे लगते हैं कि वेतीनों गुणों (रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु, तमगुण शिवजी) से ऊपर उठ कर मेरी (ब्रह्म) साधना तोकरने लगे जो अन्य देवताओं से अच्छी है परन्तु वेदों में ‘ओ3म्‘ नाम जो केवल ब्रह्म की साधना कामंत्रा है। उन ज्ञानी आत्माओं ने उसी को आप ही विचार - विमर्श करके पूर्ण ब्रह्म का मंत्रा जान करवर्षों तक साधना करते रहे। प्रभु प्राप्ति हुई नहीं। अन्य सिद्धियाँ प्राप्त हो गई। क्योंकि पवित्रा गीताअध्याय 4 श्लोक 34 तथा पवित्रा यजुर्वेद अध्याय 40 मंत्रा 10 में वर्णित तत्वदर्शी संत नहीं मिला, जो पूर्ण ब्रह्म की साधना तीन मंत्रा से बताता है। इसलिए ज्ञानी भी ब्रह्म (काल) साधना करके जन्म-मृत्यु के चक्र में ही रह गए क्योंकि गीता अध्याय 11 श्लोक 32 में गीता ज्ञान देने वाले ने कहाकि मैं काल हूँ। श्लोक 47.48 में कहा कि यह मेरा वास्तविक रूप है जिसको तेरे अतिरिक्त पहले किसी ने नहीं देखा है। मैंने तेरे पर अनुग्रह करके दर्शन दिए हैं। मेरे इस स्वरूप का दर्शन यानि काल ब्रह्म की प्राप्ति न तो वेदों का अध्ययन करने से, न यज्ञ यानि धार्मिक अनुष्ठान करने से, नदान से, न अन्य आध्यात्मिक क्रियाओं से, न उग्र तपों से हो सकती है यानि मैं देखा नहीं जा सकता हूँ। तेरे अतिरिक्त किसी को किसी भी साधना से मेरे दर्शन नहीं हो सकते। भावार्थ है किवेदों में वर्णित साधना से परमात्मा प्राप्ति नहीं होती।

गीता अध्याय 4 श्लोक 34 में गीता ज्ञान दाता ने  कहा है कि उस ज्ञान की परमात्मा  अपने मुख कमल से बोलकर सुनाता है जो तत्वज्ञान है उसको तत्वदर्शी   संतो के पास जाकर समझ उनको दवडवत प्रमाण  करने से कपट छोड़कर नम्रतापूर्वक प्रश्न करने से तत्वदर्शी संत तुजे तत्वज्ञान का उपदेश करेगे।

 Change yug
सत भक्ति करने से होगा महान परिवर्तन

» संत रामपाल जी महाराज का सर्व को संदेश » नाम कौन से राम का जपना है ?
नाम कौन से राम का जपना है ?

गीता जी के अध्याय नं. 15 का श्लोक नं. 16

द्वौ, इमौ, पुरुषौ, लोके, क्षरः, च, अक्षरः, एव, च, क्षरः, सर्वाणि, भूतानि, कूटस्थः, अक्षरः, उच्यते।।

अनुवाद: इस संसारमें दो प्रकारके भगवान हैं नाशवान और अविनाशी और ये सम्पूर्ण भूतप्राणियोंके शरीर तो नाशवान और जीवात्मा अविनाशी कहा जाता है।

गीता जी के अध्याय नं. 15 का श्लोक नं. 17

 उतमः, पुरुषः, तु, अन्यः, परमात्मा, इति, उदाहृतः, यः, लोकत्रायम् आविश्य, बिभर्ति, अव्ययः, ईश्वरः।।

अनुवाद: उत्तम भगवान तो अन्य ही है जो तीनों लोकोंमें प्रवेश करके सबका धारण-पोषण करता है एवं अविनाशी परमेश्वर परमात्मा इस प्रकार कहा गया है।

कबीर, अक्षर पुरुष एक पेड़ है, निरंजन वाकी डार।
त्रिदेवा (ब्रह्मा, विष्णु, शिव) शाखा भये, पात भया संसार।।
कबीर, तीन देवको सब कोई ध्यावै, चौथा देवका मरम न पावै।
चौथा छांडि पँचम ध्यावै, कहै कबीर सो हमरे आवै।।
कबीर, तीन गुणन की भक्ति में, भूलि पर्यौ संसार।
कहै कबीर निज नाम बिन, कैसे उतरै पार।।
कबीर, ओंकार नाम ब्रह्म (काल) का, यह कर्ता मति जानि।
सांचा शब्द कबीर का, परदा माहिं पहिचानि।।
कबीर, तीन लोक सब राम जपत है, जान मुक्ति को धाम।
रामचन्द्र वसिष्ठ गुरु किया, तिन कहि सुनायो नाम।।
कबीर, राम कृष्ण अवतार हैं, इनका नाहीं संसार।
जिन साहब संसार किया, सो किनहु न जनम्यां नारि।।
कबीर, चार भुजाके भजनमें, भूलि परे सब संत।
कबिरा सुमिरै तासु को, जाके भुजा अनंत।।
कबीर, वाशिष्ट मुनि से तत्वेता ज्ञानी, शोध कर लग्न धरै।
सीता हरण मरण दशरथ को, बन बन राम फिरै।।
कबीर, समुद्र पाटि लंका गये, सीता को भरतार।
ताहि अगस्त मुनि पीय गयो, इनमें को करतार।।
कबीर, गोवर्धन कृष्ण जी उठाया, द्रोणागिरि हनुमंत।
शेष नाग सब सृष्टी उठाई, इनमें को भगवंत।।
गरीब, दुर्वासा कोपे तहां, समझ न आई नीच।
छप्पन कोटि यादव कटे, मची रूधिर की कीच।।
कबीर, काटे बंधन विपति में, कठिन किया संग्राम।
चीन्हों रे नर प्राणियां, गरुड बडो की राम।।
कबीर, कह कबीर चित चेतहू, शब्द करौ निरुवार।
श्री रामचन्द्र को कर्ता कहत हैं, भूलि पर्यो संसार।।
कबीर, जिन राम कृष्ण निरंजन किया, सो तो करता न्यार।
अंधा ज्ञान न बूझई, कहै कबीर बिचार।।
कबीर, तीन गुणन (ब्रह्मा, विष्णु, शिव) की भक्ति में, भूल पड़यो संसार।
कहै कबीर निज नाम बिना, कैसे उतरो पार।।

शास्त्र अनुसार भक्ति
मनमाना आचरण करने से मोक्ष नही हो सकता

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Tuesday, July 7, 2020

सही शिक्षा क्या है ??

सही शिक्षा 
सही शिक्षा तो वही है जो सीखने वाले को आत्मनिर्भरता बना दे आत्मनिर्भरता से तात्पर्य यह है कि जीवन खुद सीखने वाला हो  वह खुद ऐसा बन जाए कि उसे खुद की अपनी जरूरत महसूस होने लगती है  कि मुझे अब क्या सीखना है और मुझे इस जीवन में जीने के लिए कौन सी बुक ओं का अध्ययन करना चाहिए यह आत्मा निभरता ही है

शिक्षा का महत्व
शिक्षा का ज्ञान


शिक्षा का स्तर खराब

व्यक्ति का शिक्षा का स्तर भी  दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा है  व्यक्ति शिक्षा प्राप्त करके दिन प्रतिदिन लाचारी बनता जा रहा है और शिक्षा  व्यक्ति को  इसलिए मिली है कि वह शिक्षा प्राप्त कर भगवान को पहचान सके और  सही मार्ग दर्शन कर सके जबकि  शिक्षा प्राप्त व्यक्ति आज एक दूसरे के प्रति घृणा तथा  दुराचारी बनता हुआ जा रहा है।



भगवान ने व्यक्ति को शिक्षा इसलिए दी गई थी  वह पढ़ लिख कर अपने सभी शब्द ग्रंथों को पहचान ले और भगवान का अस्तित्व को जान ले।

शिक्षा का अनमोल ज्ञान
शिक्षा का ज्ञान

उच्च शिक्षा प्राप्त कर किया हुआ व्यक्ति आज वह कई प्रकार के उपकरणों का प्रयोग कर रहा है जैसे कि गोले, बम का ऊपयोग कर व्यक्ति एक दूसरे दूसरे व्यक्ति का शत्रु   बनता जा रहा है।



अगर हम शिक्षा प्राप्त कर कर भी भगवान को नहीं पहचान सके  अथवा भगवान के  विधान को नहीं समझे तो हमारे उच्च शिक्षा का कोई भी लाभ नहीं है।


मानव जीवन में अगर हम पढ़  लिख कर भी भगवान को नहीं पहचाना सके तो हमारी शिक्षा को  धिक्कार है।
शिक्षा का उदेश्य परमात्मा को पहचान
परमात्मा का ज्ञान को जानना


शिक्षा का उद्देश्य

व्यक्ति को शिक्षा का उद्देश्य इसलिए अहम है कि वह अपने लिखिए सद्ग्रन्थों के लिखे गूढ़ रहस्यों को जानने के लिए   व्यक्ति को शिक्षा मिली है   हुआ व्यक्ति  व्यक्ति  परमात्मा के गूढ रहस्यों को जान सके कि परमात्मा कौन है तथा कैसे मिलता है तथा उसको पाने की विधि  क्या है।

उच्चकेवल ये ही व्यक्ति को  शिक्षा पाने का अधिकार है 
आज यक्ति शिक्षा ग्रहण कर  इंसानियत भूल कर बैठा है ।
परमात्मा को पहचान
परमात्मा के ज्ञान की खोज करना

शिक्षा प्राप्त हुआ व्यक्ति परमात्मा   के विधान से परिचित हो जाता है और  और वह परमात्मा से  डरने वाला  होता है और वह सही कर्म करने लगता है।

आए जानते हैं कि वह कौन है  तथा उसके पाने की  विधि क्या?
परमात्मा की जानकारी केवल संत रामपाल जी महाराज जी के बता  सकते हैं अपने सभी सद्ग्रन्थों के अनुसार  परमात्मा कबीर साहेब जी है।


पूर्ण परमात्मा कबीर
पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब जी है।

अधिक जानकारी के लिए अवश्य देखें संत रामपाल जी महाराज के मंगल प्रवचन 

  👉साधना टीवी पर 7:30 से 8:30 पीएम 
👉ईश्वर टीवी पर 8:30 से 9:30 पीएम

Tuesday, June 30, 2020

सच्चा परमात्मा कौन है।।

             सच्चा परमात्मा वह जिनका प्रमाण                     अपने सभीधर्मग्रन्थ करते हैं


सच्चा परमात्मा वह है जो व्यक्ति की समस्त प्रकार की रोगों
का निवारण कर देता है तथा उसको सुखी जीवन जीने की राह प्रदान करता है परमात्मा के गुणों में लिखा हुआ है कि वह परमात्मा व्यक्ति के घोर से  घोर पापों को भी विनाश कर देता है तथा उसको 100 वर्ष की आयु प्रदान कर देता है और उसको सुखी जीवन जीने मार्ग देता है।
 सच्चा भगवान वह है जिनका प्रमाण सभी धर्मों के सद ग्रंथों में सच्चे भगवान का प्रमाण दे रखा है कि वह  परमात्मा सतलोक में विराजमान है राजा के समान दर्शनीय है सिर पर मुकुट है और बिजली जैसी गति करके यहां पर  अच्छी आत्माओं को मिलता है और उस सतलोक स्थान की जानकारी देता है
Sat bhkti sandesh
सत भक्ति का लाभ

                    कबीर साहेब चारों युगों में आते हैं

               सतगुरु पुरुष कबीर हैं, चारों युग प्रवान।
               झूठे गुरुवा मर गए, हो गए भूत मसान।।

    ”सतयुग में कविर्देव (कबीर साहेब) का सत्सुकृत नाम से प्राकाट्य“तत्वज्ञान के अभाव से श्रद्धालु शंका व्यक्त करते हैं कि जुलाहे रूप में कबीर जीतो वि. सं. 1455 (सन् 1398) में काशी में आए हैं। वेदों में कविर्देव यही काशी वालाजुलाहा (धाणक) कैसे पूर्ण परमात्मा हो सकता है?इस विषय में दास (सन्त रामपाल दास) की प्रार्थना है कि यही पूर्ण परमात्माकविर्देव (कबीर परमेश्वर) वेदों के ज्ञान से भी पूर्व सतलोक में विद्यमान थे तथा अपनावास्तविक ज्ञान (तत्वज्ञान) देने के लिए चारों युगों में भी स्वयं प्रकट हुए हैं। सतयुग मेंसतसुकृत नाम से, त्रोतायुग में मुनिन्द्र नाम से, द्वापर युग में करूणामय नाम से तथाकलयुग में वास्तविक कविर्देव (कबीर प्रभु) नाम से प्रकट हुए हैं। इसके अतिरिक्तअन्य रूप धारण करके कभी भी प्रकट होकर अपनी लीला करके अन्तर्ध्यान हो जातेहैं। उस समय लीला करने आए परमेश्वर को प्रभु चाहने वाले श्रद्धालु नहीं पहचानसके, क्योंकि सर्व महर्षियों व संत कहलाने वालों ने प्रभु को निराकार बताया है।वास्तव में परमात्मा आकार में है। मनुष्य सदृश शरीर युक्त हैं। परंतु परमेश्वर काशरीर नाडि़यों के योग से बना पांच तत्व का नहीं है। एक नूर तत्व से बना है। पूर्णपरमात्मा जब चाहे यहाँ प्रकट हो जाते हैं वे कभी मां से जन्म नहीं लेते क्योंकि वे सर्वके उत्पत्ति कर्त्ता ह हो तो ऐसा पूर्ण प्रभु कबीर जी (कविर्देव) सतयुग में सतसुकृत नाम से स्वयं प्रकट हुए थे।उस समय गरुड़ जी, श्री ब्रह्मा जी श्री विष्णु जी तथा श्री शिव जी आदि को सतज्ञानसमझाया था। श्री मनु महर्षि जी को भी तत्वज्ञान समझाना चाहा था। परन्तु श्री मनुजी ने परमेश्वर के ज्ञान को सत न जानकर श्री ब्रह्मा जी से सुने वेद ज्ञान परआधारित होकर तथा अपने द्वारा निकाले वेदों के निष्कर्ष पर ही आरूढ़ रहे। इसकेविपरीत परमेश्वर सतसुकृत जी का उपहास करने लगे कि आप तो सर्व विपरीत ज्ञानकह रहे हो। इसलिए परमेश्वर सतसुकृत का उर्फ नाम वामदेव निकाल लिया (वामका अर्थ होता है उल्टा, विपरीत जैसे बायां हाथ को वामा अर्थात् उलटा हाथ भी कहतेहैं। जैसे दायें हाथ को सीधा हाथ भी कहते हैं)।इस प्रकार सतयुग में परमेश्वर कविर्देव जी जो सतसुकृत नाम से आए थे उससमय के ऋषियों व साधकों को वास्तविक ज्ञान समझाया करते थे। परन्तु ऋषियों नेस्वीकार नहीं किया। सतसुकृत जी के स्थान पर परमेश्वर को ‘‘वामदेव‘‘ कहने लगे।इसी लिए यजुर्वेद अध्याय 12 मंत्रा 4 में विवरण है कि यजुर्वेद के वास्तविक ज्ञानको वामदेव ऋषि ने सही जाना तथा अन्य को समझाया। पवित्रा वेदों के ज्ञान कोसमझने के लिए कृपया विचार करें - जैसे यजुर्वेद है, यह एक पवित्रा पुस्तक है।
Neme of god kabir
कबीर  साहेब जी ही पूर्ण परमात्मा है


 वेद प्रमाणित करते हैं कि वह परमात्मा कबीर साहेब जी है।

ऋग्वेद मण्डल नं. 9 सूक्त 86 मंत्रा 26.27,

 👉मण्डल नं. 9 सूक्त82 मंत्रा 1.2,



 👉मण्डल नं. 9 सूक्त 54 मंत्रा 3,



 👉मण्डल नं. 9 सूक्त 96 मंत्रा 16.20,

 👉मण्डलनं. 9 सूक्त 94 मंत्रा 2,

 👉मण्डल नं. 9 सूक्त 95 मंत्रा 1,

 👉मण्डल नं. 9 सूक्त 20 मंत्रा 1

       में कहा है कि परमेश्वर आकाश में सर्व भुवनों (लोकों) के ऊपर के लोक में तीसरे भाग में विराजमान है। वहाँ से चलकर पृथ्वी पर आता है। अपने रूप को सरल करके यानि अन्य वेश में हल्के तेज युक्त शरीर में पृथ्वी पर प्रकट होता है। अच्छी आत्माओं को यथार्थ आध्यात्म ज्ञान देने के लिए आता है। अपनी वाक (वाणी) द्वारा ज्ञान बताकर भक्ति करनेकी प्रेरणा करता है। कवियों की तरह आचरण करता हुआ विचरण करता है। अपनी महिमा के ज्ञान को कवित्व से यानि दोहों, शब्दों, चौपाईयों के माध्यम से बोलता है। जिस कारणसे प्रसिद्ध कवि की उपाधि भी प्राप्त करता है। यही प्रमाण संत गरीबदास जी ने इस अमृतवाणी में दिया है कि परमेश्वर गगन मण्डल यानि आकाश खण्ड (सच्चखण्ड) में रहताहै। वह अविनाशी है, अलेख जिसको सामान्य दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। सामान्य व्यक्तिउनकी महिमा का उल्लेख नहीं कर सकता। वह वहाँ से चलकर आता है। प्रत्येक युग में प्रकट होता है। भिन्न-भिन्न वेश बनाकर सत्संग करता है यानि तत्वज्ञान के प्रवचन सुनाताहै। कबीर जी ने बताया है कि :-

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सतयुग में सत सुकृत कह टेरा, त्रोता नाम मुनीन्द्र मेरा।।

द्वापर में करूणामय कहाया, कलयुग नाम कबीर धराया।।



           भावार्थ :-वह प्रभु परमात्मा चारों युगों में आते हैं सतयुग में  सतसुकृत के नाम से आते हैं त्रेता में मुनेंद्र के नाम से आते हैं द्वापर में करुणा नाम से आते हो कलयुग में कबीर नाम से आते है।
Kabir is god
 कबीर जी ही भगवान है कुल के

               पूर्ण परमात्मा ही सर्व जीवों का आधार

अध्याय 9 के श्लोक 3 से 6 में कहा है कि जो नियम गीता अध्याय 8 के श्लोक 5 से 10 मेंकहा है, यदि उसके आधार पर साधक साधना नहीं करता वह जन्म-मरण के चक्र में रहता है। फिरकहा है कि ये सर्व प्राणी उस परमात्मा के आधार हैं परंतु मैं इनसे न्यारा (ब्रह्मलोक में) हूँ क्योंकिकाल ब्रह्मलोक तथा इक्कीसवें ब्रह्मण्ड में अलग से रहता है तथा ब्रह्म लोक में भी महाब्रह्मा-महाविष्णुतथा महाशिव रूप में गुप्त तथा भिन्न रहता है। वास्तव में यहाँ सर्व प्राणियों को वह पूर्ण परमात्मामाया द्वारा व्यवस्थित रखता है। मैं (काल) प्राणियों में नहीं हूँ। जैसे वायु आकाश में ठहराई है वैसेही जीव उस परमात्मा में अपने कर्माधार पर उसी की (शक्ति) माया द्वारा व्यवस्थित हैं। गीताअध्याय 13 श्लोक 17 तथा अध्याय 18 श्लोक 61 में गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि पूर्ण परमात्मासर्व प्राणियों के हृदय में विशेष रूप से स्थित है। वही सर्व प्राणियों को कर्माधार से यन्त्रा की तरहभ्रमण कराता है।
Superme pawar kabir
कबीर  साहेब जी ने सृष्टि की रचना की


                  पवित्रा कुरान शरीफ में प्रमाण
प्रमाण:-👇👇👇



        " पवित्र बाइबल तथा पवित्र कुरान शरीफ में सृष्टि रचना का प्रमाण"

इसी का प्रमाण पवित्र बाईबल में तथा पवित्र कुरान शरीफ में भी है।कुरान शरीफ में पवित्र बाईबल का भी ज्ञान है, इसलिए इन दोनों पवित्र सद्ग्रन्थों ने मिल-जुल कर प्रमाणित किया है कि कौन तथा कैसा है सृष्टि रचनहार तथा उसका  नाम क्या है।

👉पवित्र बाईबल (उत्पत्ति ग्रन्थ पृष्ठ नं. 2 पर, अ. 1ः20 - 2ः5 पर)छटवां दिन :- प्राणी और मनुष्य :अन्य प्राणियों की रचना करके ।

26.   फिर परमेश्वर ने कहा, हम मनुष्य को अपने स्वरूपके अनुसार अपनी समानता में बनाएं, जो सर्व प्राणियों को काबू रखेगा।

 27. तब परमेश्वर नेमनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया, अपने ही स्वरूप के अनुसार परमेश्वर नेउसको उत्पन्न किया, नर और नारी करके मनुष्यों की सृष्टि की।



29. प्रभु ने मनुष्यों के खाने के लिए जितने बीज वाले छोटे पेड़ तथा जितने पेड़ों में बीजवाले फल होते हैं वे भोजन के लिए प्रदान किए हैं, (माँस खाना नहीं कहा है।)सातवां दिन :- विश्राम का दिन :परमेश्वर ने छः दिन में सर्व सृष्टि की उत्पत्ति की तथा सातवें दिन विश्राम किया।पवित्र बाईबल ने सिद्ध कर दिया कि परमात्मा मानव सदृश शरीर में है, जिसने छः दिन में सर्व सृष्टि की रचना की तथा फिर विश्राम किया।

       

God is form
परमात्मा साकार है

         पवित्र कुरान शरीफ (सुरत फुर्कानि 25, आयत नं. 52, 58, 59)आयत 52 :-

 फला तुतिअल् - काफिरन् व जहिद्हुम बिही जिहादन् कबीरा(कबीरन्)।।

52।इसका भावार्थ है कि हजरत मुहम्मद जी का खुदा (प्रभु) कह रहा है कि हे पैगम्बर !आप काफिरों (जो एक प्रभु की भक्ति त्याग कर अन्य देवी-देवताओं तथा मूर्ति आदि कीपूजा करते हैं) का कहा मत मानना, क्योंकि वे लोग कबीर को पूर्ण परमात्मा नहीं मानते।आप मेरे द्वारा दिए इस कुरान के ज्ञान के आधार पर अटल रहना कि कबीर ही पूर्ण प्रभु हैतथा कबीर अल्लाह के लिए संघर्ष करना (लड़ना नहीं) अर्थात् अडिग रहना।।



आयत 58 :- व तवक्कल् अलल् - हरिल्लजी ला यमूतु व सब्बिह् बिहम्दिही व कफाबिही बिजुनूबि िअबादिही खबीरा (कबीरा)।।58।भावार्थ है कि हजरत मुहम्मद जी जिसे अपना प्रभु मानते हैं वह अल्लाह (प्रभु)किसी और पूर्ण प्रभु की तरफ संकेत कर रहा है कि



 ऐ पैगम्बर उस कबीर परमात्मा परविश्वास रख जो तुझे जिंदा महात्मा के रूप में आकर मिला था। वह कभी मरने वालानहीं है अर्थात् वास्तव में अविनाशी है। तारीफ के साथ उसकी पाकी (पवित्रा महिमा)का गुणगान किए जा, वह कबीर अल्लाह (कविर्देव) पूजा के योग्य है तथा अपने उपासकों के सर्व पापों को विनाश करने वाला है।

Allah kabir
कबीर जी ही अल्लाह है

आयत 59 :- अल्ल्जी खलकस्समावाति वल्अर्ज व मा बैनहुमा फी सित्तति अय्यामिन्सुम्मस्तवा अलल्अर्शि अर्रह्मानु फस्अल् बिही खबीरन्(कबीरन्)।।59।।



भावार्थ है कि हजरत मुहम्मद को कुरान शरीफ बोलने वाला प्रभु (अल्लाह) कहरहा है कि वह कबीर प्रभु वही है जिसने जमीन तथा आसमान के बीच में जो भी विद्यमान है सर्व सृष्टि की रचना छः दिन में की तथा सातवें दिन ऊपर अपनेसत्यलोक में सिंहासन पर विराजमान हो (बैठ) गया। उसके विषय में जानकारी किसी(बाखबर) तत्वदर्शी संत से पूछो



उपरोक्त दोनों पवित्रा धर्मों (ईसाई तथा मुसलमान) के पवित्र शास्त्रों ने भी मिल-जुल कर प्रमाणित कर दिया कि सर्व सृष्टि रचनहार, सर्व पाप  विनाशक , सर्वशक्तिमान, अविनाशी परमात्मा मानव सदृश शरीर में आकार में है तथा सत्यलोक मेंरहता है। उसका नाम कबीर है, उसी को अल्लाहु अकबिरू भी कहते हैं।

Allah knowledge
 कबीर साहेब जी भगवान है

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Friday, June 26, 2020

जगन्नाथ मंदिर की कहानी ?

पुरी में श्री जगन्नाथ जी का मन्दिर कैसे बना ??

     उड़ीसा प्रांत में एक इन्द्रदमन नाम का राजा था। वह भगवान श्री कृष्ण जी का अनन्यभक्त था। एक रात्रा को श्री  कृष्ण जी ने राजा को स्वपन में दर्शन देकर कहा कि जगन्नाथ  नाम से मेरा एक मन्दिर बनवा दे। श्री कृष्ण जी ने यह भी कहा था कि इस मन्दिर में मूर्तिपूजा नहीं करनी है। केवल एक संत छोड़ना है जो दर्शकों को पवित्रा गीता अनुसार ज्ञान प्रचारकरे। समुद्र तट पर वह स्थान भी दिखाया जहाँ मन्दिर बनाना था। सुबह उठकर राजाइन्द्रदमन ने अपनी पत्नी को बताया कि आज रात्रा को भगवान श्री कृष्ण जी दिखाई दिए।मन्दिर बनवाने के लिए कहा है। रानी ने कहा शुभ कार्य में देरी क्या? सर्व सम्पत्ति उन्हीं की दी हुई है। उन्हीं को समर्पित करने में क्या सोचना है? राजा ने उस स्थान पर मन्दिर बनवा दिया।।
  
जगन्नाथ मंदिर का रहस्य


  • पांच बार मंदिर  टूटा और दुबारा बना तथा किसने बनाया इसका रहस्य क्या है ??

          मन्दिर बनने के बाद समुद्री तुफान उठा, मन्दिर को तोड़ दिया। निशान भी नहीं बचा कि यहाँ मन्दिर था। ऐसे राजा ने पाँच बार मन्दिर बनवाया। पाँचों बार समुद्र ने तोड़ दिया।राजा ने निराश होकर मन्दिर न बनवाने का निर्णय ले लिया। यह सोचा कि न जाने समुद्रमेरे से कौन-से जन्म का प्रतिशोध ले रहा है। कोष रिक्त हो गया, मन्दिर बना नहीं। कुछ समयउपरान्त पूर्ण परमेश्वर (कविर्देव) ज्योति निरंजन (काल) को दिए वचन अनुसार राजा इन्द्रदमनके पास आए तथा राजा से कहा आप मन्दिर बनवाओ। अब के समुद्र मन्दिर (महल) नहीं तोड़ेगा। राजा ने कहा संत जी मुझे विश्वास नहीं है। मैं भगवान श्री कृष्ण (विष्णु) जी के आदेशसे मन्दिर बनवा रहा हूँ। श्री कृष्ण जी समुद्र को नहीं रोक पा रहे हैं। पाँच बार मन्दिर बनवा चुका हूँ, यह सोच कर कि कहीं भगवान मेरी परीक्षा ले रहे हों। परन्तु अब तो परीक्षा देने योग्यभी नहीं रहा हूँ क्योंकि कोष भी रिक्त हो गया है। अब मन्दिर बनवाना मेरे वश की बात नहीं।परमेश्वर ने कहा इन्द्रदमन जिस परमेश्वर ने सर्व ब्रह्मण्डां की रचना की है, वही सर्व कार्य करने में सक्षम है, अन्य प्रभु नहीं। मैं उस परमेश्वर की वचन शक्ति प्राप्त हूँ। मैं समुद्र को रोक सकता हूँ (अपने आप को छुपाते हुए यर्थाथ कह रहे थे)।

जगन्नाथ मंदिर पूजा

  • छटवीं बार  मंदिर किसने बनाया
  •  उसका रहस्य ??

            प्रभु कबीर जी (कविर्देव) ने कहा कि जिस तरफ से समुद्र उठ करआता है, वहाँ समुद्र के किनारे एक चौरा (चबूतरा) बनवा दे। जिस पर बैठ कर मैं प्रभु की भक्तिकरूंगा तथा समुद्र को रोकूंगा।राजा ने एक बड़े पत्थर को कारीगरों से चबूतरा  बनवाया, परमेश्वर कबीर उस परबैठ गए। छटी बार मन्दिर बनना प्रारम्भ हुआ। उसी समय एक नाथ परम्परा के सिद्ध महात्माआ गए। नाथ जी ने राजा से कहा राजा बहुत अच्छा मन्दिर बनवा रहे हो, इसमें मूर्ति भी स्थापित करनी चाहिए। मूर्ति बिना मन्दिर कैसा? यह मेरा आदेश है। राजा इन्द्रदमन ने हाथजोड़ कर कहा नाथ जी प्रभु श्री कृष्ण जी ने मुझे स्वपन में दर्शन दे कर मन्दिर बनवाने काआदेश दिया था तथा कहा था कि इस महल में न तो मूर्ति रखनी है, न ही पाखण्ड पूजा करनीहै। राजा की बात सुनकर नाथ ने कहा स्वपन भी कोई सत होता है। मेरे आदेश का पालन कीजिए तथा चन्दन की लकड़ी की मूर्ति अवश्य स्थापित कीजिएगा।
भक्ति साधना जगन्नाथ मंदिर

  • जगन्नाथ मंदिर में मूर्तियों के  हाथ और पैरों के पंजे पूरे क्यों नही बने ??

          कारीगर वेश में प्रभु ने राजा से कहा मैंने सुना है कि प्रभु के मन्दिर के लिए मूर्तियाँ पूर्ण नहीं हो रही हैं। मैं 80 वर्ष का वृद्ध हो चुका हूँ तथा 60 वर्ष का अनुभव है।चन्दन की लकड़ी की मूर्ति प्रत्येक कारीगर नहीं बना सकता। यदि आप की आज्ञा हो तो सेवक उपस्थित है। राजा ने कहा कारीगर आप मेरे लिए भगवान ही कारीगर बन कर आये लगते हो।मैं बहुत चिन्तित था। सोच ही रहा था कि कोई अनुभवी कारीगर मिले तो समस्या का समाधान बने। आप शीघ्र मूर्तियाँ बना दो। वृद्ध कारीगर रूप में आए कविर्देव (कबीर प्रभु) ने कहा राजन मुझे एक कमरा दे दो, जिसमें बैठ कर प्रभु की मूर्ति तैयार करूंगा। मैं अंदर से दरवाजा बंद करके स्वच्छता से मूर्ति बनाऊंगा। ये मूर्तियां जब तैयार हो जायेंगी तब दरवाजा खुलेगा, यदिबीच में किसी ने खोल दिया तो जितनी मूर्तियाँ बनेगी उतनी ही रह जायेंगी। राजा ने कहा जैसाआप उचित समझो वैसा करो।



प्रभु का भेजा एक अनुभवी 80 वर्षीय कारीगर बन्द कमरें में मूर्ति बना रहा है। उसने कहा है कि मूर्तियाँ बन जाने पर मैं अपने आप द्वार खोल दूंगा। यदि किसी ने बीच में द्वार खोल दिया तो जितनी मूर्तियाँ बनी होंगी उतनी ही रह जायेंगी। आज उसे मूर्ति बनाते बारह दिन हो गये। न तो बाहर निकला है, न ही जल पानतथा आहार ही किया है। नाथ जी ने कहा कि मूर्तियाँ देखनी चाहिये, कैसी बना रहा है? बनने के बाद क्या देखना है। ठीक नहीं बनी होंगी तो ठीक बनायेंगे। यह कहकर नाथ जी राजा इन्द्रदमन को साथ लेकर उस कमरे के सामने गए जहाँ मूर्ति बनाई जा रही थी तथा आवाज लगाई कारीगर द्वार खोलो। कई बार कहा परन्तु द्वार नहीं खुला तथा जो खट-खट की आवाज आ रही थी, वह भी बन्द हो गई। नाथ जी ने कहा कि 80 वर्षीय वृद्ध बता रहे हो, बारह दिन खाना-पिना भी नहीं किया है। अब आवाज भी बंद है, कहीं मर न गया हो। धक्का मार कर दरवाजा तोड़ दिया, देखा तो तीन मूर्तियाँ रखी थी, तीनों के हाथ के व पैरों के पंजे नहीं बने थे। कारीगर अन्तर्ध्यान था।



मूर्ति स्थापना हो जाने के कुछ दिन पश्चात् लगभग 40 फूट ऊँचा समुद्र का जल उठा जिसे समुद्री तुफान कहते हैं तथा बहुत वेग से मन्दिर की ओर चला। सामने कबीर परमेश्वरचौरा (चबुतरे) पर बैठे थे। अपना एक हाथ उठाया जैसे आर्शीवाद देते हैं, समुद्र उठा का उठारह गया तथा पर्वत की तरह खड़ा रहा, आगे नहीं बढ़ सका। विप्र रूप बना कर समुद्र आयातथा चबूतरे पर बैठे प्रभु से कहा कि भगवन आप मुझे रास्ता दे दो, मैं मन्दिर तोड़ने जाऊंगा।प्रभु ने कहा कि यह मन्दिर नहीं है। यह तो महल (आश्रम) है। इस में विद्वान् पुरुष रहा करेगा तथा पवित्रा गीता जी का ज्ञान दिया करेगा। आपका इसको विधवंश करना शोभा नहीं देता।समुद्र ने कहा कि मैं इसे अवश्य तोडूंगा। प्रभु ने कहा कि जाओ कौन रोकता है? समुद्र ने कहा कि मैं विवश हो गया हूँ। आपकी शक्ति अपार है। मुझे रस्ता दे दो प्रभु। परमेश्वर कबीर साहेब जी ने पूछा कि आप ऐसा क्यों कर रहे हो? विप्र रूप में उपस्थित समुद्र ने कहा कि जब यहश्री कृष्ण जी त्रोतायुग में श्री रामचन्द्र रूप में आया था तब इसने मुझे अग्नि बाण दिखा कर बुरा भला कह कर अपमानित करके रास्ता मांगा था। मैं वह प्रतिशोध लेने जा रहा हूँ।परमेश्वर कबीर जी ने कहा कि प्रतिशोध तो आप पहले ही ले चुके हो। आपने द्वारिका को डूबो रखा है। समुद्र ने कहा कि अभी पूर्ण नहीं डूबा पाया हूँ, आधी रहती है। वह भी कोई प्रबल शक्ति युक्त संत सामने आ गया था जिस कारण से मैं द्वारिका को पूर्ण रूपेण नहीं समापाया। अब भी कोशिश करता हूँ तो उधर नहीं जा पा रहा हूँ। उधर जाने से मुझे बांध रखा है।।

रहस्य जगन्नाथ पुरी का

  • जगन्नाथ मंदिर में छुआछूत क्यों नही है इसका रहस्य क्या ??

                      कुछ दिन पश्चात जिस पांडे ने प्रभु कबीर जी को शुद्र रूप में धक्का मारा था उसको कुष्ट रोग हो गया। सर्व औषधी करने पर भी स्वस्थ नहीं हुआ। कुष्ट रोग का कष्ट अधिक सेअधिक बढ़ता ही चला गया। सर्व उपासनायें भी की, श्री जगन्नाथ जी से रो-रोकर संकट निवार्णके लिए प्रार्थना की, परन्तु सर्व निष्फल रही। स्वपन में श्री कृष्ण जी ने दर्शन दिए तथा कहापांडे उस संत के चरण धोकर चरणामृत पान कर जिसको तुने मन्दिर के मुख्य द्वार पर धक्का मारा था। तब उसके आशीर्वाद से तेरा कुष्ट रोग ठीक हो सकता है। यदि उसने तुझे हृदयसे क्षमा किया तो, तेरा कुष्ट रोग समाप्त होगा अन्यथा नहीं। मरता क्या नहीं करता?

वह मुख्य पांडा सवेरे उठा। कई सहयोगी पांडों को साथ लेकर उस स्थान पर गया जहाँ पर प्रभु कबीर जी शुद्र रूप में विराजमान थे। ज्यों ही पांडा प्रभु के निकट आया तो परमेश्वरउठ कर चल पड़े तथा कहा हे पांडा मैं तो अछूत हूँ मेरे से दूर रहना, कहीं आप अपवित्रा नहो जायें। पांडा निकट पहूँचा, परमेश्वर और आगे चल पड़े। तब पांडा फूट-फूट कर रोने लगातथा कहा परवरदीगार मेरा दोष क्षमा कर दो। तब दयालु प्रभु रूक गए। पांडे ने आदर के साथ एक स्वच्छ वस्त्रा जमीन पर बिछा कर प्रभु को बैठने की प्रार्थना की। प्रभु उस वस्त्रा पर बैठ गए।तब उस पांडे ने स्वयं चरण धोए तथा चरणामृत को पात्रा में वापिस डाल लिया। प्रभु कबीर जीने कहा पांडे चालीस दिन तक इसे पीना भी तथा स्नान करने वाले जल में कुछ डाल कर स्नान करते रहना। चालीसवें दिन तेरा कुष्ट रोग समाप्त होगा तथा कहा कि भविष्य में भी इस जगन्नाथ जी के मन्दिर में किसी ने छूआछात किया तो उसको भी दण्ड मिलेगा। सर्व उपस्थित व्यक्तियों ने वचन किए कि आज के बाद इस पवित्रा स्थान पर कोई छुआ-छात नहीं की जायेगी।
अदभुत रहस्य जगन्नाथ पुरी का

विचार करें :- 
                हिन्दुस्तान का एकमात्रा ऐसा मन्दिर है जिसमें प्रारम्भ से ही छूआ-छात नहीं रही है।

जगन्नाथ पुरी के पूरे प्रकरण को जानने के लिए अवश्य देखे संत रामपाल जी महाराज के सुप्रसिद्ध चैंनलों पर सत्संग।
👉साधना टीवी पर।
7:30से8:30pm
👉ईश्वर टीवी पर
8:30से9:30pm
👉श्रद्धा  टीवी पर
2:00से3:00am

Wednesday, June 24, 2020

काशी में करौंत की कथा ?

काशी में करौंत  की कथा 

शास्त्राविधि त्यागकर मनमाना आचरण करने यानि शास्त्रों में लिखी भक्ति विधि अनुसार साधना न करने से गीता अध्याय 16 श्लोक 23 में लिखा है कि उस साधक को न तो सुख की प्राप्ति होती है, न भक्ति की शक्ति (सिद्धि) प्राप्त होती है, न उसकी गति(मुक्ति) होती है अर्थात् व्यर्थ प्रयत्न है। हिन्दू धर्म के धर्मगुरू जो साधना साधक समाज कोबताते हैं, वह शास्त्रा प्रमाणित नहीं है। जिस कारण से साधको को परमात्मा की ओर से कोईलाभ नहीं मिला जो भक्ति से अपेक्षित किया। फिर धर्मगुरूओं ने एक योजना बनाई कि।।

                             काशी करोंत  

            भगवान शिव का आदेश हुआ है कि जो काशी नगर में प्राण त्यागेगा, उसके लिए स्वर्ग का द्वार खुल जाएगा। वह बिना रोक-टोक के स्वर्ग चला जाएगा। जो मगहर नगर (गोरखपुरके पास उत्तरप्रदेश में) वर्तमान में जिला-संत कबीर नगर (उत्तर प्रदेश) में है, उसमें मरेगा,वह नरक जाएगा या गधे का शरीर प्राप्त करेगा। गुरूजनों की प्रत्येक आज्ञा का पालन करना अनुयाईयों का परम धर्म माना गया है। इसलिए हिन्दू लोग अपने-अपने माता-पिताको आयु के अंतिम समय में काशी (बनारस) शहर में किराए पर मकान लेकर छोड़ने लगे।यह क्रिया धनी लोग अधिक करते थे। धर्मगुरूओं ने देखा कि जो यजमान काशी में रहनेलगे हैं, उनको अन्य गुरूजन भ्रमित करके अनुयाई बनाने लगे हैं। काशी, गया, हरिद्वार आदि-आदि धार्मिक स्थलों पर धर्मगुरूओं (ब्राह्मणों) ने अपना-अपना क्षेत्रा बाँट रखा है। यदिकोई गुरू अन्य गुरू के क्षेत्रा वाले यजमान का क्रियाकर्म कर देता है तो वे झगड़ा कर
              यदि कोई गुरू अन्य गुरू के क्षेत्रा वाले यजमान का क्रियाकर्म कर देता है तो वे झगड़ा कर देतेहैं। मारपीट तक की नौबत आ जाती है। वे कहते हैं कि हमारी तो यही खेती है, हमारा निर्वाह इसी पर निर्भर है। हमारी सीमा है। इसी कारण से काशी के शास्त्राविरूद्ध साधना कराने वाले ब्राह्मणों ने अपने यजमानों से कहा कि आप अपने  माता-पिता को हमारे घर रखो। जो खर्च आपका मकान के किराए में तथा खाने-पीने में होता है, वह हमें दक्षिणा रूपमें देते रहना। हम इनकी देखरेख करेंगे। इनको कथा भी सुनाया करेंगे। उनके परिवार वालों को यह सुझाव अति उत्तम लगा और ब्राह्मणों के घर अपने वृद्ध माता-पिता को छोड़ने लगे और ब्राह्मणों को खर्चे से अधिक दक्षिणा देने लगे। इस प्रकार एक ब्राह्मण के घर प्रारम्भ में चार या पाँच वृद्ध रहे। अच्छी व्यवस्था देखकर सबने अपने वृद्धों को काशी में गुरूओं केघर छोड़ दिया। गुरूओं ने लालच में आकर यह आफत अपने गले में डाल तो ली, परंतु संभालना कठिन हो गया। वहाँ तो दस-दस वृद्ध जमा हो गए। कोई वस्त्रों में पेशाब करदेता, कोई शौच आँगन में कर देता। यह समस्या काशी के सर्व ब्राह्मणों को थी। तंग आकर एक षड़यंत्रा रचा। गंगा दरिया के किनारे एकान्त स्थान पर एक नया घाट बनाया। उस परएक डाट (।तबी) आकार की गुफा बनाई। उसके बीच के ऊपर वाले भाग में एक लकड़ी चीरने का आरा यानि करौंत दूर से लंबे रस्सों से संचालित लगाया ।

 Om knowledge

           उस करौंत को पृथ्वीके अंदर  से लगभग सौ फुट दूर से मानव चलाते थे। ब्राह्मणों ने इसी योजना के तहत नया समाचार अपने अनुयाईयों को बताया कि परमात्मा का आदेशआया है। पवित्रा गंगा दरिया के किनारे एक करौंत परमात्मा का भेजा आता है। जो शीघ्र स्वर्ग जाना चाहता है, वह करौंत से मुक्ति ले सकता है। उसकी दक्षिणा भी बता दी। वृद्धव्यक्ति अपनी जिंदगी से तंग आकर अपने पुत्रों से कह देते कि पुत्रो! एक दिन तो भगवानके घर जाना ही है, हमारा उद्धार शीघ्र करवा दो। इस प्रकार यह परंपरा जोर पकड़ गई।बच्चे-बच्चे की जुबान पर यह परमात्मा का चमत्कार चढ़ गया। अपने-अपने वृद्धों को उसकरौंत से कटाकर मुक्ति मान ली। यह धारणा बहुत दृढ़ हो गई। कभी-कभी उस करौंत कारस्सा अड़ जाता तो उस मरने वाले से कह दिया जाता था कि तेरे लिए प्रभु का आदेश नहींआया है। एक सप्ताह बाद फिर से किस्मत आजमाना। इस तरह की घटनाओं से जनताको और अधिक विश्वास होता चला गया। जिसके नम्बर पर करौंत नहीं आता था, वह दुःखी होता था। अपनी किस्मत को कोसता था। मेरा पाप कितना अधिक है। मुझे परमात्मा कबस्वी कार करेगा? वे पाखण्डी उसकी हिम्मत बढ़ाते हुए कहते थे कि चिन्ता न कर, एक-दो दिन में तेरा दो बार नम्बर लगा देंगे। तब तक रस्सा ठीक कर लेते थे और हत्या का कामजारी रखते थे। इसको काशी में करौंत लेना कहते थे और गारण्टिड  मुक्ति होना मानते थे। स्वर्ग प्राप्ति का सरल तथा जिम्मेदारी के साथहोना माना जाता था जबकि यह अत्यंत निन्दनीय अपराधिक कार्य था। वाणी नं. 104 में कहा है कि शास्त्रा अनुकूल भक्ति के बिना कुछ भी लाभ नहींहोगा चाहे काशी में करौंत से गर्दन भी कटवा लो। कुछ बुद्धिजीवी व्यक्ति विचार किया करतेथे कि स्वर्ग प्राप्ति के लिए तो राजाओं ने राज्य त्यागा। जंगल में जाकर कठिन तपस्या की।शरीर के नष्ट होने की भी चिंता नहीं की। यदि स्वर्ग प्राप्त करना इतना सरल था तो यहविधि सत्य युग से ही प्रचलित होती। यह तो सबसे सरल है। सारी आयु कुछ भी करो। वृद्धअवस्था में काशी में निवास करो या करौंत से शीघ्र मरो और स्वर्ग में मौज करो। इसलिएवाणी नं. 104 में कहा है कि इससे भी कई शंकाएँ बनी रहती थी। यह विधि भी संदेह केघेरे में थी। यदि इतना ही मोक्ष मार्ग है तो गीता जैसे ग्रन्थ में लिखा होता। ऐसी शास्त्रा विरूद्ध क्रिया से मन के विकार भी समाप्त नहीं होते। विकारी जीव का मोक्ष होना बताना, संदेहस्पष्ट है।।
Geeta knowledg

  ये नकली धर्म गुरुआओ तथा पाखंडी ब्राह्मण  फेलाई हुई गलत धारण थी जिसे परमात्मा के बच्चों को परमात्मा की भक्ति भर्मित किया ।
अपने सभी धर्म के सद्ग्रन्थों में  लिखा हुआ कि  मनमानी भक्ति साधना करने से जीव का मोक्ष नही हो सकता है और वह भक्ति साधना वह परमात्मा हर युग मे आकर बताता है ।

सत भक्ति करने से जीव का मोक्ष हो सकता हैं।

असली भक्ति साधना तो कबीर परमात्मा ने बताई जिसका प्रमाण अपने सभी धर्म के  सद्ग्रन्थों में लिखा हुआ।

काशी में करौंत   की कथा का रहस्य जानने के लिए  अवश्य देखे  संत रामपाल जी महाराज  का सत्संग सुप्रसिद्ध  चैंनलों पर सत्संग।
👉साधना टीवी पर
7:30से8:30pm
👉ईश्वर टीवी पर
8:30से9:30pm
👉श्रद्धा टीवी पर
2:00

भैया दूज क्या है??

भाई दूज        राखी के बाद मनाया जाता है। पहले दीपावली उसके अगले दिन गोवर्धन पूजा और फिर भाई दूज मनाया जाता है। Bhai Dooj के दिन बहनें भाई क...