Tuesday, June 23, 2020

Shree bhgwat Geeta

Shreebhgwad


गीता ज्ञान श्री कृष्ण जी ने नहीं बोला पवित्र गीता 11 श्लोक 21व46 में अर्जुन कह रहा है कि है सहत्र बाहु आप अपने उसी चतुर्भुज रूप में आइए काल ब्रह्म की 1000 भुजाएं हैं जबकि चार भुजाएं हैं ।


गीता अध्याय 15 श्लोक 4 में कहां है कि तत्वदर्शी संत की प्राप्ति के पश्चात उस परम पद परमेश्वर की खोज करनी चाहिए जहां जाने के पश्चात साधक लौट कर वापस नहीं आता है तथा मोक्ष प्राप्त करता है ।।


‘‘गीता अध्याय 15 श्लोक 1.4 का सारांश’’।।

 सृष्टि रूपी वृक्ष का वर्णन।।अध्याय 15 के श्लोक 1 में कहा है कि ऊपर को पूर्ण परमात्मा रूपी जड़ वाला नीचे को तीनोंगुण (रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी, तमगुण शिवजी) रूपी शाखा वाला संसार रूपी एकअविनाशी विस्तृत वृक्ष है। जैसे पीपल का वृक्ष है। उसकी डार व साखाएँ होती हैं। जिसकेछोटे-छोटे हिस्से (टहनियाँ) पते आदि हैं। जो संसार रूपी वृक्ष के सर्वांग जानता है, वह वेद केतात्पर्य को जानने वाला पूर्ण ज्ञानी अर्थात् तत्वदर्शी संत है। कबीर परमेश्वर जी कहते हैं :--
कबीर, अक्षर पुरुष एक पेड़ है, निरंजन (ब्रह्म) वाकि डार। तीनों देवा शाखा हैं, पात रूप संसार।।
कबीर, हम ही अलख अल्लाह हैं, मूल रूप करतार। अनन्त कोटि ब्रह्मण्ड का, मैं ही सिरजनहार।।
यह उल्टा लटका हुए संसार रूपी वृक्ष है। ऊपर को जड़ें (पूर्णब्रह्म परमात्मा-परम अक्षरपुरुष) सतपुरुष है, अक्षर पुरुष (परब्रह्म) जमीन से बाहर दिखाई देने वाला तना है तथा ज्योतिनिरंजन (ब्रह्म/क्षर) डार है और तीनों देवा (ब्रह्मा-विष्णु-महेश) शाखा हैं। छोटी टहनियाँ और पत्तेदेवी-देवता व आम जीव जानों।
अध्याय 15 के श्लोक 2 में कहा है कि उस (अक्षर पुरुष रूपी) वृक्ष की नीचे और ऊपर गुणों(ब्रह्मा-रजगुण, विष्णु-सतगुण, शिव-तमगुण) रूपी फैली हुई विषय विकार (काम, क्रोध, मोह,लोभ, अहंकार) रूपी कोपलें व डाली (ब्रह्मा-विष्णु-शिव) रूपी। इस जीवात्मा को कर्मों के अनुसारबाँधने का मुख्य कारण है तथा नीचे पाताल लोक में, ऊपर स्वर्ग लोक में व्यवस्थित किए हुए हैं।

(गीता जी के अध्याय 14 के श्लोक 5 में प्रमाण है कि - हे महाबाहो (अर्जुन)! सतगुण, रजगुण, तथा तमगुण जोप्रकृति (माया) से उत्पन्न हुए हैं। ये तीनों गुण जीवात्मा को शरीर में बाँधते हैं।) अध्याय 15 के श्लोक 3 में गीता बोलने वाला ब्रह्म कह रहा है कि इस (रचना) का न तो शुरुका ज्ञान, न अंत का और न ही वैसा स्वरूप (जैसा दिखाई देता है) पाया जाता है तथा यहाँ विचारकाल में अर्थात् तेरे मेरे इस गीता ज्ञान संवाद में मुझे भी इसकी अच्छी तरह स्थिति का ज्ञान नहींहै। इस स्थाई स्थिति वाले मजबूत संसार रूपी वृक्ष अर्थात् सृष्टि रचना को पूर्ण ज्ञान रूप (सूक्ष्मवेद के ज्ञान से) शस्त्रा से काट कर अर्थात् अच्छी तरह जान कर काल (ब्रह्म) व ब्रह्मा-विष्णु-शिवतीनों गुणों व पित्रों- भूतों- देवी- देवताओं, भैरां, गूगा पीर आदि से मन हट जाता है। इसलिए इससंसार रूपी वृक्ष को काटना कहा है।अध्याय 15 के श्लोक 4 में गीता ज्ञान दाता ने बताया है कि उपरोक्त तत्वदर्शी संत जिसकागीता अध्याय 15 श्लोक 1 व अध्याय 4 श्लोक 34 में भी वर्णन है मिलने के पश्चात उस स्थान(सतलोक-सच्चखण्ड) की खोज करनी चाहिए जिसमें गए हुए साधक फिर लौट कर (जन्म-मरणमें) इस संसार में नहीं आते अर्थात् अनादि मोक्ष प्राप्त करते हैं और जिस परमात्मा से आदि समयसे चली आ रही सृष्टि उत्पन्न हुई है। मैं काल ब्रह्म भी उसी अविगत पूर्ण परमात्मा की शरण में हूँ।उसी पूर्ण परमात्मा की ही भक्ति पूर्ण निश्चय के साथ करनी चाहिए, अन्य की नहीं।



गीता स्पष्ट लिखा हुआ कि  पूर्ण परम् अक्षर बह्म की भक्ति करने से ही जीव का मोक्ष होगा।
गीता  अध्याय 15 श्लोक 4 में कहां है तत्वज्ञान समझने के पश्चात उस मूल रूप परमेश्वर की परम पद यानी सतलोक की खोज करनी चाहिए जिसमें गए हुए साधक लौटकर संसार मे  कभी नहीं आते हैं और जिस परमेश्वर परम अक्षर पुरुष से पुरानी यानी आदिवाली सृष्टि उत्पन्न हुई है उस सनातन पूर्ण परमात्मा की शरण में मै  हहु यानी मेरा पूजा परमेश्वर इष्ट देव भी वही है पूर्ण  निश्चय के साथ उसकी परमात्मा की भक्ति करनी चाहिए

आए जानते हैं और अधिक की परम अक्षर बह्म कौन तथा उसके पाने की विधि क्या?
अवश्य देखे इस सत्संग को।
7:30से8:30pm

Wednesday, June 17, 2020

Janmashtmi:Lord shree krishna

जन्माष्टमी


श्री कृष्ण जी के पांडवों द्वारा किए गए अश्वमेध यज्ञ में उपस्थित रहने के बाद भी वह यज्ञ संपूर्ण नहीं हुआ कि श्री कृष्ण जी के तीन लोक के भगवान  है और पूर्ण परमात्मा कबीर साहिब जी है  जो अविनाशी है जिन्होंने दो रोटी खा कर 7 पीढ़ी  राज दिया  वही परमात्मा शक्तिशाली है ।


श्री कृष्ण जी तीन लोक के स्वामी है ये हमे पिछले जन्म का किया हुआ ही  हमे ये प्रधान कर सकते है।असंख्य ब्रमांड का स्वामी कबीर परमेश्वर जी है जो  हमारे ऊपर आये हुई सभी पाप कर्मों को काट देते है तथा व्यक्ति को सुखी जीवन प्रधान करते है।

श्री कृष्ण जी ने इंद्र जो  देवी देवताओं का राजा है उसकी पूजा भी छुड़वा कर उस एक परमात्मा  की भक्ति करने के लिए प्रेरणा दी थी जिस कारण उन्होंने गोवर्धन पर्वत उठाकर इंद्र के को कोप  बृजवासी की रक्षा की वह परमेश्वर कबीर जी है।

परमेश्वर कबीर साहिब जी ने अपने सतलोक से सशरीर आए थे और लाखों लोगों की उपस्थिति में सशरीर चले गई थे जबकि श्री कृष्ण का जन्म  मां की कोख से पैदा हुए  है और शिकारी के तीर से  मृत्यु को प्राप्त हुए वेदों में लिखा है कि भगवान कभी मां के गर्भ से जन्म नहीं लेता है।

श्री कृष्ण जी महाभारत का युद्ध चाह कर भी नही  रुकवा सके और जिसमे करोड़ों लोग मारे गए वही कबीर साहिब जी ने अपनी अंतिम समय मैं हिंदू मुस्लिम के बीच में होने  वाले महाविनाश को भी रोक लिया था केवल  शक्तिशाली परमात्मा तो केवल कबीर साहिब जी है।

श्री कृष्ण  जी बांसुरी बजाते थे तो आसपास की गोपियां और गाये आ कर सुनते थे परमेश्वर कबीर साहिब जी ने यमुना के किनारे एक बात बांसुरी बजाई थी तो यमुना का पानी स्थिर  हो गया सभी पशु पक्षी यहां तक की आसमान में देवता भी उस बांसुरी की मधुर आवाज को सुनने के लिए पृथ्वी पर आ गए थे



तो आए जानते हैं कि वह शक्तिशाली परमेश्वर कौन है तथा कहा पर रहता था किसने देखा एयर उसके पाने की विधि क्या है।
इन सभी बातों की जानकारी प्राप्त करने के लिए अवश्य देखे संत रामपाल जी महाराज के सत्संग सुप्रसिद्ध चैंनलों पर ।


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www.jagatgururampalji.org

Tuesday, June 16, 2020

पूजा तथा साधना में अंतर ?

प्रश्न :- काल ब्रह्म की पूजा करनी चाहिए या नहीं? गीता में प्रमाण दिखाऐं।उत्तरः- नहीं करनी चाहिए। पहले आप जी को पूजा तथा साधना का भेद बताते हैं।भक्ति अर्थात् पूजा :- जैसे हमारे को पता है कि पृथ्वी के अन्दर मीठा शीतलजल है। उसको प्राप्त कैसे किया जा सकता है? उसके लिए बोकी के द्वारा जमीन में सुराख किया जाता है, उस सुराख (ठवतम) में लोहे की पाईप डाली जाती है,फिर हैण्डपम्प (नल) की मशीन लगाई जाती है, तब वह शीतल जीवन दाता जलप्राप्त होता है।हमारा पूज्य जल है, उसको प्राप्त करने के लिए प्रयोग किए उपकरण तथा प्रयत्न साधना जानें। यदि हम उपकरणों की पूजा में लगे रहे तो जल प्राप्त नहीं कर सकते, उपकरणों द्वारा पूज्य वस्तु प्राप्त होती है।


गीता अध्याय 7 श्लोक 12 से 15 में तो गीता ज्ञान दाता ने बता दिया कितीनों गुणों (रजगुण श्री ब्रह्मा जी, सतगुण श्री विष्णु जी तथा तमगुण श्री शिव जी)की भक्ति व्यर्थ है। फिर गीता अध्याय 7 के श्लोक 16.17.18 में गीता ज्ञान दाताब्रह्म ने अपनी भक्ति से होने वाली गति अर्थात् मोक्ष को “अनुत्तम” अर्थात् घटियाबताया है। बताया है कि मेरी भक्ति चार प्रकार के व्यक्ति करते हैं।
1. अर्थार्थी :- धन लाभ के लिए वेदों अनुसार अनुष्ठान करने वाले।
2. आर्त :- संकट निवारण के लिए वेदों अनुसार अनुष्ठान करने
वाले।
3. जिज्ञासु :- परमात्मा के विषय में जानने के इच्छुक।(ज्ञान ग्रहण करके स्वयं वक्ता बन जाने वाले)इन तीनों प्रकार के ब्रह्म पुजारियों को व्यर्थ बताया है।

4. ज्ञानी :- ज्ञानी को पता चलता है कि मनुष्य जन्म बड़ा दुर्लभ है।
         मनुष्य जीवन प्राप्त करके आत्म-कल्याण कराना चाहिए। उन्हें यह भी ज्ञान हो जाता हैकि अन्य देवताओं की पूजा से मोक्ष लाभ होने वाला नहीं है। इसलिए एक परमात्माकी भक्ति अनन्य मन से करने से पूर्ण मोक्ष संभव है। उनको तत्वदर्शी सन्त नमिलने से उन्होंने जैसा भी वेदों को जाना, उसी आधार से ब्रह्म को एक समर्थ प्रभुमानकर यजुर्वेद अध्याय 40 मन्त्रा 15 से ओम् नाम लेकर भक्ति की, परन्तु पूर्ण मोक्षनहीं हुआ। ओम् (ऊँ) नाम ब्रह्म साधना का है, उससे ब्रह्मलोक प्राप्त होता है जोकिपूर्व में प्रमाणित किया जा चुका है। गीता अध्याय 8 श्लोक 16 में कहा है कि ब्रह्मलोक प्रयन्त सब लोक पुनरावर्ती में हैं अर्थात् ब्रह्म लोक में गए साधक भी पुनःलौटकर संसार में जन्म-मृत्यु के चक्र में गिरते हैं।काल ब्रह्म की साधना से वह मोक्ष प्राप्त नहीं होता जो गीता अध्याय 15श्लोक 4 में बताया है कि “तत्वज्ञान से अज्ञान को काटकर परमेश्वर के उस परमपद की खोज करनी चाहिए जहाँ जाने के पश्चात् साधक फिर लौटकर संसार मेंकभी वापिस नहीं आते।

गीता अध्याय 7 श्लोक 18 में गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि ये ज्ञानीआत्मा (जो चौथे नम्बर के ब्रह्म के साधक कहें हैं) हैं तो उदार अर्थात् नेक, परंतुये तत्वज्ञान के अभाव से मेरी अनुत्तम् गति में ही स्थित रहे। गीता ज्ञान दाता नेअपनी साधना से होने वाली गति को भी अनुत्तम अर्थात् घटिया कहा है, इसलिएब्रह्म पूजा करना भी उचित नहीं।कारण :- एक चुणक नाम का ऋषि ज्ञानी आत्मा था। उसने ओम् (ऊँ) नामका जाप तथा हठयोग हजारों वर्ष किया। जिससे उसमें सिद्धियाँ आ गई। ब्रह्म कीसाधना करने से जन्म-मृत्यु, स्वर्ग-नरक का चक्र सदा बना रहेगा क्योंकि गीताअध्याय 2 श्लोक 12ए गीता अध्याय 4 श्लोक 5ए गीता अध्याय 10 श्लोक 2 में गीताज्ञान दाता ब्रह्म ने कहा है कि अर्जुन! तेरे और मेरे अनेकों जन्म हो चुके हैं, तू नहींजानता, मैं जानता हूँ। तू, मैं तथा ये सर्व राजा लोग पहले भी जन्में थे, आगे भीजन्मेंगे। यह न सोच कि हम सब अब ही जन्में हैं। मेरी उत्पत्ति को महर्षिजन तथाये देवता नहीं जानते क्योंकि ये सब मेरे से उत्पन्न हुए हैं।

जो शास्त्रा विधि अनुसार भक्ति करने से सिद्धि प्राप्त होती है, वह गेहूँ काभुस (तूड़ा) समझें जो पशुओं के लिए उपयोगी तथा खाने में सुगम होता है। भावार्थहै कि शास्त्राविधि अनुसार साधना न करने से जो सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, वे साधकको नष्ट करती हैं क्योंकि अज्ञानतावश ऋषिजन उनका प्रयोग करके किसी कीहानि कर देते हैं, किसी को आशीर्वाद देकर अपनी भक्ति की शक्ति जो ¬ नामके जाप से होती है, उसको समाप्त करके फिर से खाली हो जाते हैं।जैसे चुणक ऋषि जी ने मानधाता चक्रवर्ती राजा की 72 करोड़ सेना का नाशकर दिया, अपनी भक्ति की सिद्धि भी खो दी। सूक्ष्मवेद में कहा है कि :-गरीब, बहतर क्षौणी क्षय करी, चुणक ऋषिश्वर एक।देह धारें जौरा (मृत्यु) फिरैं, सब ही काल के भेष।।भावार्थ :- ऋषियों में सर्वश्रेष्ठ ऋषि चुणक जी ने 72 करोड़ सेना का नाशकर दिया। ये दिखाई तो देते हैं महात्मा, लेकिन जब इनसे पाला पड़ता है तो येनिकलते हैं सर्प जैसे, जरा-सी बात पर श्राप दे देना, किसी से बेमतलब पंगा लेलेना इनके लिए आम बात होती है।


           अधिक जानकारी के लिए अवश्य                                       देखे संत रामपाल जी महाराज के                                        सुप्रसिद्ध चैंनलों पर।
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Tuesday, June 9, 2020

Bible

Bible

रूढ़िवादी यीशु बाइबिल में कहा गया है कि भगवान कबीर हैं। और यह एकमात्र पुस्तक नहीं है जो इसे वेद, कुरान के रूप में बताती है, गुरु ग्रंथ साहिब भी इसी बिंदु को समझाते हैं।


अब्राहमिक धर्मों में 4 महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं। यीशु को बाइबल दी गई जो एक पवित्र आत्मा थी। सर्वोच्च परमेश्वर अल्लाह हु अकबर खुद अपनी जानकारी देने आता है। सभी के पिता भगवान कबीर हैं।

स्वाद के लिए किसी भी जानवर को मत मारो। कुछ लोग कहते हैं कि गाय को मारना पाप है जबकि दूसरे का सुअर के लिए भी यही कहना है। भगवान कहते हैं कि उनके द्वारा बनाई गई प्रत्येक आत्मा उनके पुत्र या पुत्री है इसलिए किसी को मारना भी उतना ही पाप है।


बाइबल में लिखा है कि मनुष्य को प्रभु ने अपने ही स्वरूप  जैसा बनाया और 6 दिन में सृष्टि  रचना के बाद 7 वे  दिन तख्त पर जा विराजा  वह प्रभु  कबीर जी है।


अधिक जानकारी के लिए
अवश्य देखें संत रामपाल जी महाराज जी के सुप्रसिद्ध चैंनलों  पर सत्संग 
👉साधना टीवी पर 7:30 से 8:30 पीएम 
👉ईश्वर टीवी पर 8:30 से 9:30 पीएम 

👉श्रद्धा टीवी पर 2:00 से 3:00 am

Thursday, June 4, 2020

कबीर साहेब का प्रकट दिवस बनाया जाता हैं न कि जयंती।।

 परमात्मा कबीर साहिब जी 600 साल पहले काशी में एक शिशु के रूप में कमल के फूल पर प्रकट हुए थे और हजारों लोगों की उपस्थिति में मगहर से सतलोक गए थे। शव के स्थान पर फूल मिले थे, जिसके प्रमाण मगहर में मौजूद हैं। इसलिए, कबीर साहिब का प्रकट दिवस मनाया जाता है, न कि जयंती।

कबीर परमात्मा माँ से जन्म नहीं लेते। उनका शरीर पाँच  तत्ववों से बने रक्त-मांस का नहीं है, बल्कि एक तत का अमर शरीर है, और इसलिए प्रकट दिवस मनाया जाता है, न कि कबीर साहेब की जयंती।

 चाम लाहु न मोरे, जन सतनाम उपसी।
 तारण तरण अभय पद (मोक्ष) दाता, मुख हूं कबीर अविनाशी ।।

वर्ष 1398 में, ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा के दिन, कबीर परमेस्वर ब्रह्म मुहूर्त में सत्यलोक से आए और लहराटारा तालाब में कमल के फूल पर विराजमान हुए। जहां से निःसंतान बुनकर दंपत्ति नीरू-नीमा उसे ले गए। प्रत्येक वर्ष इस अवसर पर कबीर प्रकट दिवस मनाया जाता है।
 कबीर, ना मेरा जनम न गरभ बसरा, बालक बन दिखलाया।
काशी नगर जल कमल प्र डेरा, यहां जुलाहे न पावे ।।

परमारेश्वर कबीर साहिब जी 600 साल पहले काशी में एक शिशु के रूप में कमल के फूल पर दिखाई दिए और मगहर से चले गए। हजारों लोगों की उपस्थिति में, वह अपने शरीर के साथ सतलोक गया। शव के स्थान पर फूल मिले थे, जिसके प्रमाण आज भी मगहर में मौजूद हैं। इसलिए, कबीर साहिब का प्रकट दिवस मनाया जाता है, न कि जयंती।
* कबीर साहेब स्वयं प्रकट होते हैं, इसलिए अभिव्यक्ति का दिन मनाया जाता है *
 ऋग्वेद मंडल १०, सूक्त ४, मन्त्र ३ में स्पष्ट है कि माता परमात्मा को जन्म नहीं देती है, लेकिन वे स्वयं अपनी आत्मा को काल के बंधन से छुड़ाने के लिए अपनी शब्द शक्ति द्वारा उन्हें शिशु रूप में प्रकट करते हैं।
 इस बात के प्रमाण हैं कि कबीर परमेश्वर ने काशी लाहरतार सरोवर में कमल के फूल पर स्वयं को प्रकट किया, जिसका चित्रण अष्टानंद ऋषि थे।

कबीर परमेश्वर का प्रकट दिवस मनाया जाता है, जयंती नहीं। जो जन्म लेता है उसके लिए जयंती मनाई जाती है। कबीर परमेश्वर जन्म और मृत्यु से मुक्त हैं और वे अविनाशी हैं। काशी में लहराटारा तालाब में कमल के फूल और माघ में सतलोक जाने के बाद शरीर के स्थान पर फूल खोजने के साक्ष्य मिले हैं। इसलिए, कबीर परमेश्वर का प्रकट दिवस मनाया जाता है।
💢💢
👉 Note
#कबीरसाहेब  जी प्रकट दिवस  के उपलक्ष में  कल यानी 5 जून साधना चैंनल 📺 पर क सुबह🕗 9:00बजे  से 12:00तक सत्संग प्रसारित किया जायेगा।
 अवश्य देखे।।

Wednesday, June 3, 2020

पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब जी का अदभुत ज्ञान !

आज तक किसी ऋषि, महर्षि धर्मगुरू ने
सृष्टि रचना की सही जानकारी नहीं दी..
कबीर परमेश्वर जी ने सृष्टि रचना का यथार्थ जानकारी शास्त्र प्रमाण सहित दी।
 कबीर परमेश्वर ने आकर यथार्थ भक्ति विधि बताई, जो अत्यधिक सरल है जिसे रोजमर्रा के काम करते हुए भी कर सकते हैं।
नाम उठत, नाम बैठत, नाम सोवत जाग वे।
नाम खाते, नाम पीते, नाम सेती लाग वे।।

 कबीर परमेश्वर जी ने सृष्टि की रचना का वास्तविक ज्ञान कराया व बयाता किस प्रभु की भक्ति करने से सर्व सुख व पूर्ण मोक्ष मिल सकता है।

धर्मदास यह जग बौराना, कोई न जाने पद निरवाना,
यही कारण मैं कथा पसारा, जग से कहियो एक राम न्यारा।
कबीर परमेश्वर जी ने मानव को समझाया कि गुरू के बिना भक्ति करना निष्फल है। राम कृष्ण ने भी गुरु बनाकर भक्ति की इसलिए गुरू बनाना आवश्यक है। गुरू पूरा हो
 कबीर साहेब जी से पहले केवल तीन लोक तक का ज्ञान था। कबीर परमात्मा ने सतलोक (अमर लोक) का भेद बताया तथा उसकी प्राप्ति की भक्ति विधि बताई।

कबीर परमेश्वर ने बताया कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश की भी जन्म तथा मृत्यु होती है। इनकी माता दुर्गा तथा पिता काल (ब्रह्म) हैं।
कबीर, मां अष्टांगी पिता निरंजन, ये जम दारुण वंशन अंजन।
तीन पुत्र अष्टंगी जाए, ब्रह्मा विष्णु शिव नाम धराए।
 कौन ब्रह्मा का पिता है, कौन विष्णु की मां
शंकर का दादा कौन है, हमको दे बता‌?
कबीर परमेश्वर जी ने सृष्टि रचना में ब्रह्मा विष्णु महेश के माता-पिता और दादा की संपूर्ण जानकारी प्रमाण सहित बताई।

 कबीर परमेश्वर जी ने गुरू और सतगुरू में भेद बताया तथा सच्चे गुरु के लक्षण बताए।
सतगुरु के लक्षण कहु, मधुरे बेन विनोद, चार वेद छः सास्त्र, वो कह अट्ठारह बोध।। पूर्ण परमात्मा कौन है, कैसा है, कहां रहता है, कैसे मिलता है और किसने देखा है?
यथार्थ जानकारी प्रमाण सहित कबीर परमात्मा जी ने बताई।
कबीर साहिब जी ने तत्वज्ञान दिया कि मानव जीवन में सतगुरु बनाकर भक्ति करना परमावश्यक है। सच्चे गुरु की शरण में जाकर दीक्षा लेने से ही पूर्ण लाभ मिलेगा, अन्यथा मानव जीवन बर्बाद है।

 कबीर परमात्मा द्वारा बताई सृष्टि रचना की जानकारी से ही हमे पता चलता है कि गीता का ज्ञान श्रीकृष्ण में प्रवेश करके काल/ब्रह्म ने बोला, ब्रह्मा विष्णु शिव भी जन्म मृत्यु में है, तथा इनके भी माता पिता है। इसका प्रमाण अन्य शास्त्रों में भी मिलता है कबीर परमेश्वर जी ने सभी धर्मों के लोगों को संदेश दिया कि सब मानव एक परमात्मा की संतान है। परमात्मा ने सबको एक बनाया है। अज्ञानता वश हम अलग-अलग जाति धर्मों में बंट गये। भगवान के घर कोई जाति धर्म नहीं है।
 सर्वप्रथम पूर्ण परमात्मा कबीर परमेश्वर ने ही बताया कि अलग-अलग देवों की भक्ति से मिलने वाले लाभ का स्तर भी अलग-अलग है। परंतु सर्वोच्च स्तर पूर्ण परमात्मा का ही है। जो मोक्ष दायक भी है।

 तीन देव की जो करते भक्ति, उनकी की भी न होवै मुक्ति।
कबीर परमेश्वर ने बताया कि रजगुण ब्रह्माजी, सतगुण विष्णुजी, तमगुण शिवजी तक की साधना करने वाले साधकों की मोक्ष नहीं हो सकती कबीर परमेश्वर जी ने लोगों को नशा, मांस भक्षण तथा शराब सेवन से दूर रहने की प्रेरणा दी। बुराइयों से मनुष्य के शारीरिक दुर्गति के साथ आध्यात्मिक पतन भी होता है। कभी परमेश्वर जी ने मानव को समझाते हुए कहा कि मनुष्य जीवन में भक्ति करना अत्यावश्यक है अन्यथा जीवन हानि होगी तथा नरक व चौरासी का कष्ट भुगतना पडेगा।
कबीर, मानुष जन्म पाय कर, नहीं रटे हरि नाम।
जैसे कुआं जल बिना, बनवाया किस काम।।

वह पूर्ण परमात्मा केवल कबीर साहेब जी उन्होंने ही अपने सभी धर्मो के सद्ग्रन्थों का ज्ञान मानव समाज को दिया है।
वेद प्रमाणित करते है कि वह कबीर देव है उसकी जानकारी आज संत रामपाल जी महाराज जी दे रहे हैं।

अवश्य देखें संत रामपाल जी महाराज जी के सुप्रसिद्ध चैंनलों  पर सत्संग
👉साधना टीवी पर 7:30 से 8:30 पीएम
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Tuesday, June 2, 2020

हर युग मे कबीर साहेब लीलाए करते है।

मीराबाई कृष्ण जी की भक्ति में लीन थीं और मोक्ष के मार्ग से वंचित थीं। अपनी प्रिय आत्मा को अपनी शरण में लेने के लिए, एक बार भगवान कबीर जी रविदास जी के साथ उनके शहर में सत्संग करने पहुँचे। जब मीराबाई ने उस सत्संग को सुना, तो वह अद्भुत ज्ञान से प्रेरित थी। उसने भगवान कबीर की शरण ली और उसका कल्याण किया

भगवान कबीर जी जिंदा महात्मा के रूप में 7 साल की उम्र में दादू साहिब से मिले और उन्हें ज्ञान समझाया और उन्हें सतलोक दिखाया।
इसलिए, भगवान कबीर जी की महिमा करते हुए; दादू साहेब जी कहते हैं "जिन मोकु ​​निज नाम दीया, सोई सतगुरु हमार, दादू दोसरा कोई नाहीं, कबीर सिरजनहार"


हनुमान जी का कल्याण
श्री राम जी के अयोध्या लौटने और सीता द्वारा महल से अपमानित और निष्कासित किए जाने के बाद, हनुमान जी भगवान कबीर जी से मिले जो त्रेता में ऋषि मुनींद्र के रूप में प्रकट हुए थे। सच्चे उपदेश देकर उन्होंने इस संत आत्मा को मोक्ष का मार्ग दिखाया



स्वामी रामानंद जी से ज्ञान चर्चा के लिए आए गोरखनाथ जी से परमेश्वर कबीर जी ने खुद चर्चा की और गोरखनाथ जी को पराजित कर सत्य ज्ञान से परिचित करवा मोक्ष की राह दिखाई।

 कबीर परमात्मा ने चीरहरण में द्रौपदी का चीर बढ़ाकर लाज बचाई।
गरीब, पीतांबर कूं पारि करि, द्रौपदी दिन्हीं लीर।
अंधे कू कोपीन कसि, धनी कबीर बधाये चीर।।
नीरू को धन प्राप्ति


असली राम कबीर जी हैं, उनके हर तमाशे के साथ भगवान की शक्ति का एहसास होता है।
सतलोक से कमल के फूल पर उनका अवतरण हुआ।
एक अनपढ़ का तमाशा खेलते हुए उन्होंने ऐसा ज्ञान दिया जो शास्त्रों में संस्कृत जानने वाले लोगों द्वारा आज तक नहीं पाया गया।
मृतक कमल और कमली का जीवन बहाल करना।
उनका सारा समय दूसरों को परमात्मा का एहसास कराने और फिर मगहर से पूरे शरीर में सतलोक लौटने का था।
वह असली राम कौन है।

और भी बहुत सारी लीलाए है कबीर साहेब जी उनका मुख्य उद्देश्य यही होता है मानव समाज को सतज्ञान व सतभक्ति देकर कल्याण करना है।

और भी आध्यात्मिक  ज्ञान की जानकारी के लिये हमारे साथ जुड़े रहे ।
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भैया दूज क्या है??

भाई दूज        राखी के बाद मनाया जाता है। पहले दीपावली उसके अगले दिन गोवर्धन पूजा और फिर भाई दूज मनाया जाता है। Bhai Dooj के दिन बहनें भाई क...